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धामा-मिलम सड़क निर्माण की राह में चट्टानें बनीं रोड़ा

Sun, 11 Nov 2018 10:29 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मुनस्यारी
ब्यूरो/अमर उजाला, मुनस्यारी Updated Sun, 11 Nov 2018 10:29 PM IST
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Dhamma-Mum road makes roads rocks
मुनस्यारी की धापा-मिलम सड़क - फोटो : अमर उजाला

चीन सीमा पर सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण धापा-मिलम सड़क निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी गति से चल रही है। इस सड़क को 2020 तक पूरा करना है, लेकिन लगता नहीं है कि यह सड़क अपने तय लक्ष्य पर पूरी हो पाएगी। इसकी वजह सड़क बनाने के बीच में आ रही चट्टानें हैं, जिन्हें काट पाना आसान नहीं है। हालांकि, बीआरओ की ओर से सड़क बनाने का कार्य जारी रखा हुआ है।

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जहां एक ओर चीन ने अपनी सीमाओं के हर एक दर्रे तक सड़कें और मूलभूत सुविधाएं पहुंचा दी हैं, वहीं भारत अब तक सीमाओं की सुरक्षा के लिए पैदल मार्गों के भरोसे चल रहा है। बीआरओ की ओर से वर्ष 2008 से धापा-मिलम सड़क बनाई जा रही है। यह सड़क अब तक धापा से लीलम और मिलम से नहरदेवी तक लगभग 34 किमी ही कट पाई है। सड़क कुल 61 किमी बननी है। इस सड़क की पूर्ण होने की अवधि पहले 2012 फिर 2018 और अब 2020 तक बढ़ाई जा चुकी है। बावजूद इसके सड़क निर्माण की गति बेहद सुस्त है। लीलम से नहरदेवी के बीच कठोर चट्टानें हैं, जिन्हें काट पाना आसान नहीं है।
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सेवानिवृत्त ऑनरेरी कै. गिरधर सिंह रावत बताते हैं कि भारतीय सीमा पर अंतिम गांव मिलम जोहार घाटी की उत्तर दिशा में है। ब्रिटिशकाल में यह गांव तत्कालीन जिला अल्मोड़ा का सबसे बड़ा गांव हुआ करता था। उस समय मिलम में लगभग 500 मकान हुआ करते थे। तब तिब्बत व्यापार भी इस रास्ते से संचालित होता था, जो कि स्थानीय लोगों की रोजी रोटी का एकमात्र व्यवसाय था। साथ ही कैलाश यात्रा भी इसी रूट से संचालित होती थी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियों के विसर्जन के लिए कैलाश मानसरोवर जाने के लिए इस रास्ते का प्रयोग किया गया था।
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1962 के आक्रमण के बाद वीरान हुआ मिलम
मुनस्यारी। 1962 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने, भारत पर आक्रमण करने और दलाईलामा के भारत में शरण लेने के बाद तिब्बत व्यापार समाप्त हो गया। इसके चलते लोगों को गांव छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। देखते ही देखते पूरा गांव खंडहर में तब्दील हो गया। अब कुछ ही लोग माइग्रेशन पर अप्रैल से अक्तूबर तक मिलम जाते हैं। सामरिक दृष्टि महत्वपूर्ण धापा-मिलप सड़क के बनने से न केवल सीमा तक पहुंच आसान होगी, वहीं जोहार घाटी में पड़ने वाले 13 गांव भी आबाद हो सकेंगे।

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