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‘आओ एक नया बस्तड़ी फिर से बसाएं’
अमर उजाला ब्यूरो पिथौरागढ़
Updated Mon, 25 Jul 2016 12:30 AM IST
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बस्तड़ी में पीड़ितों को प्रेरित करे चंद्र बल्लभ
- फोटो : अमर उजाला
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बड़ी आपदाओं का शिकार होने के बाद कोई भी व्यक्ति या तो विचलित हो जाता है या फिर वह आगे के जीवन के प्रति निराश हो जाता है, लेकिन बस्तड़ी की आपदा में सबसे ज्यादा प्रभावित चंद्रबल्लभ भट्ट ने खुद को संभालते हुए गांव के अन्य लोगों को भी प्रेरित करने का काम शुरू कर दिया है।
प्राथमिक विद्यालय ओझागांव के शिक्षक 50 वर्षीय चंद्रबल्लभ के परिवार पर आपदा का सबसे ज्यादा कहर बरपा था। 30 जून की रात सबसे पहले उनका मकान ही मलबे की चपेट में आया। खुद तो चंद्रबल्लभ उस काली रात को घर पर नहीं थे, लेकिन मकान में सो रही उनकी 85 वर्षीय मां रमुली देवी, 65 वर्षीय बहन सरस्वती देवी, 40 वर्षीय पत्नी दीपा और इकलौती बेटी रिंपी की मलबे में दबकर मौत हो गई। गौशाले में बंधे 17 जानवर हादसे में मारे गए।
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घटना के करीब एक सप्ताह तक तो चंद्रबल्लभ बेहद विषाद की स्थिति में रहे, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। उनको लगा कि शायद विधाता को यही मंजूर होगा, लेकिन अब बस्तड़ी में जो जिंदगियां बच गई हैं, उनकी निराशा को तोड़ने की मुहिम उन्होंने छेड़ दी है। चंद्रबल्लभ ने नारा दिया है ‘आओ एक नया बस्तड़ी फिर से बसाएं’। मलबे से पटे बस्तड़ी में तो अब रह पाना संभव नहीं है, लेकिन वह कहते हैं कि सिंघाली कस्बे के पास गांव के लोगों की जो जमीन है,उसमें नए सिरे से मकान बनाए जाएं। सरकार पर वह यही दबाव बना रहे हैं कि मकानों के लिए हर परिवार को पैसा दिया जाए।
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चंद्रबल्लभ कहते हैं कि लोगों को फिर से खेती करनी चाहिए। जानवरों को पालना चाहिए, यदि लोग साहस करें तो वह जल्द ही इस विपदा से उबर भी सकते हैं। लोग चंद्रबल्लभ की बातों को इसलिए गौर से सुन रहे हैं क्योंकि आपदा का सबसे बड़ा दर्द सहने वाला ही उनको जीवन की सच्चाई के लिए प्रेरित कर रहा है। चंद्रबल्लभ ने बताया कि उनकी सारी संपत्ति भी मलबे की भेंट चढ़ गई। परिवार का कोई भी सदस्य जिंदा नहीं बचा।
बस्तड़ी निवासी शंकर दत्त भट्ट कहते हैं कि चंद्रबल्लभ का साहस काबिलेतारीफ है। गांव के लोगों को उनकी बातों से भरोसा बढ़ रहा है। जीवन के प्रति निराशा का भाव कम हो रहा है। वह कहते हैं कि जो मर गए हैं वह लौट के नहीं आ सकते, लेकिन जो जीवित हैं उनको जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए सबकुछ चाहिए।
मूल बस्तड़ी गांव अब कभी आबाद नहीं हो पाएगा। उसमें मलबा इस कदर पटा है कि आने वाले कई वर्षों तक वह साफ नहीं हो सकता। मकानों का मलबा बिखरा है। उसी मलबे में कई लोग आज भी दफन हैं। दर्जनों जानवर इसी मलबे के अंदर रह गए हैं। बस्तड़ी गांव में जाने का साहस भी किसी में नहीं है।