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बौराणी के ऐतिहासिक मेले का रंगारंग आगाज
ब्यूरो/अमर उजाला, बेड़ीनाग
Updated Fri, 23 Nov 2018 10:36 PM IST
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बौराणी मेले का शुभारंभ करती विधायक मीना गंगोला
- फोटो : अमर उजाला
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बौराणी के ऐतिहासिक मेले का शुभारंभ सैम मंदिर प्रांगण में हो गया है। इस दौरान लोक कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए। महिलाओं ने झोड़ा-चांचरी से समा बांध दिया। मेले का मुख्य आकर्षण 27 फुट लंबी चीड़ के छिलके की मशाल होती है जो मध्य रात्रि में मंदिर पहुंची।
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मुख्य अतिथि विधायक मीना गंगोला शुक्रवार अपरान्ह तीन बजे दीप जलाकर मेले का शुभारंभ किया। उन्होंने बौराणी मेले को राजकीय मेला घोषित कराने के लिए सरकार से अनुरोध करने का आश्वासन दिया। मेला क्षेत्र के सौंदर्यीकरण, मंच निर्माण और दर्शक दीर्घा विधायक निधि से बनाने की घोषणा की। भाजपा नेता गोकुल गंगोला ने कहा कि मेले को पांच दिन तक किए जाने और इसे व्यापारिक मेले के रूप में विकसित करने का सरकार से अनुरोध किया जाएगा। मेले में कई स्थानीय सांस्कृतिक ग्रुपों ने कार्यक्रम पेश किए। महिला समूह की महिलाओं ने आकर्षक झोड़ा और चांचरी गाई।
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राइंका झलतोला और एएसजीएम स्कूल के बच्चों ने छोलिया नृत्य पेश किया। बेड़ीनाग बौराणी मेला एवं सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष, जिपं सदस्य राजेंद्र बोरा शिवजी ने कहा कि मेले का इतिहास गौरवशाली रहा है। बीच के कुछ वर्षों तक यहां पर जुएं की कुप्रथा पांव पसारने लगी थी। क्षेत्र के युवाओं ने 13 वर्ष पूर्व इस कुप्रथा को जड़ से मिटा दिया।
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संचालन नानू बिष्ट ने किया। इस मौके पर महिला मोर्चा अध्यक्ष गणाई क्षेत्र मंजू डसीला, रविंद्र बनकोटी, उमेश डसीला, विनोद डसीला, जगत बोरा, मोहन जोशी, शेर सिंह बोरा, बलवंत सिंह रावत, सांस्कृतिक संयोजक कल्याण सिंह बोरा आदि थे।
बौराणी मेले का ऐतिहासिक महत्व
बेड़ीनाग। बौराणी मेले का मुख्य आकर्षण पुलई चापड़ गांव से लाई जाने वाली चीड़ के छिलके से निर्मित 27 फुट लंबी मशाल होती है। इस मशाल को प्रत्येक मेलार्थी द्वारा अवश्य देखने की परंपरा है। माना जाता है कि इसे देखने मात्र से ही सुख-समृद्धि मिलती है। मंदिर की सात परिक्रमा के बाद इसे परिसर में गाड़ दिया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार सैम मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा को मशाल लाने की सदियों पुरानी परंपरा है। मान्यता है कि अखंड धूनी में देव डांगर नौर्त के माध्यम से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।