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पानी के अभाव में एक सीजन के लिए बंजर छोड़ना पड़ा

Thu, 22 Dec 2016 10:28 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल (पिथौरागढ़)।
ब्यूरो/अमर उजाला, थल (पिथौरागढ़)। Updated Thu, 22 Dec 2016 10:28 PM IST
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Barren had to leave for a season in the absence of water
पानी के अभाव में एक सीजन के लिए बंजर छोड़ना पड़ा - फोटो : अमर उजाला
2000 में बरार लघु जल विद्युत परियोजना का निर्माण हुआ था। बरड़ नदी का सारा पानी इस परियोजना के लिए ले जाया गया और गोल, टमटौड़ा गांव के लिए इसी नदी से बनी सिंचाई नहर सूख गई।
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इसका नतीजा यह हुआ कि गोल, टमटौड़ा गांव के लोगों को अपनी सबसे उपजाऊ 60 हेक्टेअर जमीन को पानी के अभाव में एक सीजन के लिए बंजर छोड़ना पड़ गया। इन खेतों में सिर्फ धान की बुआई होती है। गेहूं की बुआई सूखे खेतों में संभव नहीं हो पाती।
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गोल गांव के लिए 2009 में लघु डाल सिंचाई विभाग ने अपनी एक योजना रामगंगा से तैयार की लेकिन इस योजना का पानी विभाग इन सूखे खेतों तक नहीं पहुंचा पाया।

गांव के लोग बताते हैं कि वर्ष 2000 से पहले इस जमीन में साल में दो फसलें बोते थे। बारिश के मौसम में धान की रोपाई की जाती थी और बाद में गेहूं की फसल को बोते थे। बरड़ नहर से इन खेतों को पर्याप्त पानी मिल जाता था। खेतों में गेहूं के अलावा मसूर, मटर, सरसों भी बोई जाती थी। विद्युत परियोजना के लिए नदी का सारा पानी ले जाने से नहर सूख गई। फिर गांव के लोगों ने लघु डाल विभाग की सिंचाई की लिफ्ट योजना की मांग की।
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2009 में लिफ्ट योजना बन गई लेकिन 60 हेक्टेअर जमीन तक फिर भी पानी नहीं पहुंच पाया। लघु डाल विभाग के अधिशासी अभियंता एनएस देउपा का कहना है कि खेतों तक पानी किन कारणों से नहीं पहुंच रहा है इसका पता लगाएंगे और कोशिश की जाएगी कि खेतों तक पानी पहुंच जाए। 


खेती को बढ़ावा देने की बात मत करे सरकार
 गोल टमटौड़ा निवासी भावना देवी का कहना है कि सरकार को पहाड़ की खेती को बढ़ावा देने की बात नहीं करनी चाहिए। जब सरकार खेतों तक पानी नहीं पहुंचा पा रही तो फसल कैसे पैदा होगी। वह कहती है कि ऐसी योजनाएं बनानी ही क्यों हैं जिससे पहाड़ की खेती तबाह हो जाए। 



लापरवाही की जांच होनी चाहिए
गोल टमटौड़ा निवासी भागीरथी देवी का कहना है कि इस तरह की लापरवाही की जांच की जाए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। वह कहती हैं कि खेतों में पानी न पहुंचने के लिए जिम्मेदार अफसरों को दंड मिलना चाहिए। इससे गांव के लोगों की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। 
 
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