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पर्यटन विभाग की नजर से ओझल हुआ थल का प्राचीनतम बालेश्वर मंदिर

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 28 Jun 2022 12:21 AM IST
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Baleshwar Mahadev in Thal
थल के रामगंगा नदी किनारे स्थित बालीश्वर मंदिर। संवाद - फोटो : PITHORAGARH
थल (पिथौरागढ़)। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मानसखंड मंदिरमाला मिशन के तहत प्राचीन मंदिरों को मानसखंड सर्किट से जोड़ने के लिए पर्यटन विभाग ने कुमाऊं क्षेत्र के छह जिलों के 30 प्राचीन मंदिरों के नाम की घोषणा की है। इनके अवस्थापना और सौंदर्यीकरण के लिए मंदिरों को चिह्नित किया है। लेकिन थल के रामगंगा, बहुला और क्रांति नदी के त्रिवेणी संगम में स्थित प्राचीनतम बालेश्वर महादेव के मंदिर को इसके परिधि में नहीं रखा गया है।
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लोगों का कहना है कि त्रेता युग में बानरराज बाली ने इसी संगम में एक पांव में खड़े होकर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। प्रसन्न होकर शिव ने बाली को बाल रूप में दर्शन देकर स्वंयभू शिवलिंग में समाहित हो गए और यह बालेश्वर या बालीश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 7वीं सदी में बलतिर गांव में बालतीर्थ के रूप बालेश्वर मंदिर की स्थापना हुई, 9वीं सदी में गोल गांव के वर्तमान इंटर कॉलेज में और 9वीं सदी में ही त्रिरथ नागर शैली कलाकृति के एक मंदिर की स्थापना थल के पास बहुला और रामगंगा नदी के तट पर हुई। चंद राजा के शासन काल में 12 वीं सदी में उद्योत चंद राजा ने मंदिर की स्थापना की थी। प्राचीन काल में यही से पवित्र कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू होती थी। राजा उद्योत चंद ने कोटिगांव के पुजारियों को ताम्रपत्र भी दिया था जो आज भी धरोहर के रूप में उनके पास मौजूद है। स्कंद पुराण के मानसखंड के 108 वें अध्याय में प्राचीन बालेश्वर महादेव के मंदिर की महिमा का उल्लेख किया गया है कि यहां दर्शन करने मात्र से काशी के बराबर फल मिलता है। क्रांति, बहुला और रामगंगा नदी के त्रिवेणी संगम में माघ के धर्म के महीने में स्नान करने से सारे अरिष्टों का परिहार हो जाते हैं। संगम में डुपकी लगाने से मानव के सारे पाप धुल जाते हैं। उत्तर भारत में चार देवालयों में शुमार इस देवालय में वर्ष भर में उत्तरायणी, शिवरात्रि और बैशाखी पर्व पर भव्य मेला लगता है। इसके बाद भी इसे मानसखंड मंदिर माला में शामिल नहीं किया गया है।
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स्कंद पुराण के मानस खंड के 108 वें अध्याय के 17 वें श्लोक में इस स्वयंभू शिवलिंग वाले पौराणिक बालेश्वर मंदिर को सभी फल प्राप्ति का सर्वोत्तम तीर्थ माना गया है। ऐसे प्राचीन मानसखंड वर्णित मंदिर को मानसखंड सर्किट से नहीं जोड़ना आश्चर्य का विषय है। इस संबंध में जल्दी सीएम से मुलाकात की जाएगी। -सुरेंद्र सिंह पांगती, ज्येष्ठ उप प्रमुख।
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