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पहली बारिश में ही छूटे प्रशासन के पसीने

Mon, 09 May 2016 10:31 PM IST
ब्यूराे/अमर उजाला, पिथौरागढ़
ब्यूराे/अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Mon, 09 May 2016 10:31 PM IST
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Administration sweat left in the first rain
पहली बारिश - फोटो : अमर उजाला

 इस बार मानसून की बारिश औसत से ज्यादा होने के संकेत मौसम विभाग ने दिए हैं। उसके कुछ लक्षण पहले ही सामने आ गए हैं। जिला मुख्यालय में रविवार को हुई मूसलाधार बारिश के समय कई घरों में पानी घुसने, नालों का रुख पलटने से प्रशासन के पसीने छूट गए। अभी आपदा का दौर शुरू नहीं हुआ है। उस समय स्थिति कैसे संभलेगी यह कहना कठिन है।

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जिला मुख्यालय में सिनेमा लाइन में कुंडीखोला नाले का रुख पलटने से त्रिलोक सिंह बिष्ट और सावित्री देवी के मकानों में पानी घुस गया। पानी का निकास आज तक भी नहीं हो पाया है। लोगों का कहना है कि लोनिवि और नगरपालिका में जमा मिट्टी और मलबे को हटाने का प्रयास नहीं किया। साथ ही आभास होने के बाद भी सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए। जब घरों में पानी घुस जाने के बाद खतरा हुआ तब प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची। पीड़ित त्रिलोक सिंह बिष्ट का कहना है कि नगर क्षेत्र में पानी के निकास की सही व्यवस्था नहीं की गई है। अभी तो पहली बारिश हुई है।
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आगे जब बारिश का मौसम आएगा तो उस समय इस तरह की समस्या बढ़ने लगेगी। उन्होंने कहा कि घर में पानी शुक्रवार को हुई बारिश के समय ही घुस गया था। जब दूसरे दिन इसकी सुरक्षा के लिए अधिकारियों से आग्रह किया गया तो उन्होंने कोई गौर नहीं किया। दो दिन बाद रविवार को हुई बारिश के समय स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। त्रिलोक सिंह बिष्ट के मकान में आज भी पानी भरा हुआ है।
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जिले में अत्यधिक संवेदनशील गांवों की संख्या 21
 जिला आपदा प्रबंधन विभाग ने जिले में आपदा की दृष्टि से संवेदनशील गांवों की प्रारंभिक सूची तैयार कर ली है। इन सभी गांवों में राज्य सरकार की ओर से भेजी गई भूवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और इंजीनियरों की टीम सर्वे कर रही है। सर्वे के बाद यह टीम अपनी रिपोर्ट शासन को देगी। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी डा. आरएस राणा ने बताया कि जिले में अत्यधिक संवेदनशील गांवों की संख्या 21, अति संवेदनशील गांवों की संख्या 10 और संवेदनशील गांवों की संख्या 26 है। इन गांवों में सबसे पहले सक्रिय भूस्खलन का ट्रीटमेंट का काम किया गया है। धारचूला और मुनस्यारी तहसील में नदियों के किनारे स्थित खतरे वाले गांवों के किनारे अब सुरक्षा दीवार लगाने का काम पूरा हो गया है। उन्होंने कहा कि इन गांवों पर खास नजर रखी जाएगी। यदि मानसून सीजन में गांवों को कोई खतरा हुआ तो उससे पहले ही इनको शिफ्ट कर दिया जाएगा।



विस्थापन के पीछे सामाजिक अड़चन
 सरकार ने इस बार आपदा प्रभावित गांवों के सर्वे में समाज विज्ञानियों की टीम को इसीलिए भेजा है कि वह विस्थापन के बारे में लोगों की राय जानें। मोटे तौर पर यही कहा गया कि आपदा से प्रभावित गांव के लोग अपने समाज को छोड़कर अन्यत्र जाने के पक्ष में नहीं रहते। गांवों के आसपास सुरक्षित जमीन की तलाश कर पाना कठिन होता है। ज्यादातर प्रभावित लोग तराई में बसने के इच्छुक रहते हैं लेकिन इसमें भी कई व्यावहारिक कठिनाईयां आती हैं। तराई में पूरे गांव को बसाने के लिए एकमुश्त जमीन नहीं मिलती। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी डा. आरएस राणा का कहना है कि समाज विज्ञानियों को सर्वे में भेजने के पीछे मुख्य मकसद यही है कि लोगों के विचारों को जान सकें और विस्थापन की संभावना पर उनकी स्थिति का आकलन कर सकें।

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