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स्वरोजगार अपनाकर चंद्र सिंह ने दी नई दिशा
Updated Sun, 06 Aug 2017 11:04 PM IST
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डीडीहाट (पिथौरागढ़)। उद्यान विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद चंद्र सिंह नित्वाल ने पांच वर्ष पहले जीआईसी मार्ग पर फलों पर आधारित उद्योग स्थापित कर समाज के लोगों को नई दिशा देने का काम किया है। यही नहीं पिता के काम से प्रेरित होकर उनके बेटे मंटू नित्वाल ने दिल्ली की प्राइवेट नौकरी छोड़ दी और अब अपने पिता के साथ काम में हाथ बंटाने लगा है। डीडीहाट क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के फल, फूल काफी मात्रा में पैदा होते हैं, लेकिन प्रसंस्करण की कोई इकाई न होने के कारण इन फलों का उचित दाम नहीं मिल पाता था। चंद्र सिंह ने लोगों से फलों को खरीदना शुरू किया और उनसे कई प्रकार की सामग्री तैयार की।
चंद्र सिंह बताते हैं कि अधिकांश लोग सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद या तो शहरों में जाकर बस जाते हैं या फिर खाली बैठ जाते हैं। उद्यान विभाग में नौकरी करते समय ही उन्होंने जिले में पैदा होने वाले फलों, उनके प्रसंस्करण की जानकारी हासिल ले ली थी। 2012 में उन्होंने स्वरोजगार की यह इकाई स्थापित की और 2013 में उनको पंतनगर में लगे कृषि मेले में श्रेष्ठ उद्यमी का पुरस्कार मिल गया। चंद्र सिंह हर साल अपने उत्पादों को दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में भी ले जाते हैं। उनके यहां बने बुरांश के जूस की सबसे ज्यादा मांग है।
इसके अलावा वह माल्टा, संतरा का जूस तैयार करते हैं। आम, नींबू, कचनार का अचार बनाते हैं। हर सीजन में पैदा होने वाले फलों से वह सामग्री तैयार करते रहते हैं। नाशपाती का मुरब्बा तैयार कर वह इन फलों को नष्ट होने से बचाते हैं। चंद्र सिंह ने बताया कि उद्यम स्थापित करते समय बैंक से कर्ज लिया गया। धीरे-धीरे काम बढ़ने लगा। आज वह खुद, उनका बेटा और दो कारीगर इसमें काम करते हैं। वह महीने में करीब 50 हजार रुपये तक कमा लेते हैं।
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चंद्र सिंह का कहना है कि पहाड़ पर स्वरोजगार अपनाकर बेरोजगारी को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग खुद जोखिम उठाने को तैयार नहीं रहते।
कई शहरों तक पहुंच चुके उत्पाद
चंद्र सिंह नित्वाल द्वारा तैयार उत्पादों को देश के विभिन्न शहरों में रहने वाले लोग अपने साथ लेकर जाते हैं। डीडीहाट और आसपास के गांवों के जो लोग देश के विभिन्न शहरों में काम कर रहे हैं, वह वर्ष में एक बार यहां आकर अचार, जूस, मुरब्बा जैसी सामग्री लेकर जाते हैं। सबसे अधिक मांग बुरांश के जूस की रहती है।
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चंद्र सिंह बताते हैं कि अधिकांश लोग सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद या तो शहरों में जाकर बस जाते हैं या फिर खाली बैठ जाते हैं। उद्यान विभाग में नौकरी करते समय ही उन्होंने जिले में पैदा होने वाले फलों, उनके प्रसंस्करण की जानकारी हासिल ले ली थी। 2012 में उन्होंने स्वरोजगार की यह इकाई स्थापित की और 2013 में उनको पंतनगर में लगे कृषि मेले में श्रेष्ठ उद्यमी का पुरस्कार मिल गया। चंद्र सिंह हर साल अपने उत्पादों को दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में भी ले जाते हैं। उनके यहां बने बुरांश के जूस की सबसे ज्यादा मांग है।
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इसके अलावा वह माल्टा, संतरा का जूस तैयार करते हैं। आम, नींबू, कचनार का अचार बनाते हैं। हर सीजन में पैदा होने वाले फलों से वह सामग्री तैयार करते रहते हैं। नाशपाती का मुरब्बा तैयार कर वह इन फलों को नष्ट होने से बचाते हैं। चंद्र सिंह ने बताया कि उद्यम स्थापित करते समय बैंक से कर्ज लिया गया। धीरे-धीरे काम बढ़ने लगा। आज वह खुद, उनका बेटा और दो कारीगर इसमें काम करते हैं। वह महीने में करीब 50 हजार रुपये तक कमा लेते हैं।
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चंद्र सिंह का कहना है कि पहाड़ पर स्वरोजगार अपनाकर बेरोजगारी को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन समस्या यह है कि ज्यादातर लोग खुद जोखिम उठाने को तैयार नहीं रहते।
कई शहरों तक पहुंच चुके उत्पाद
चंद्र सिंह नित्वाल द्वारा तैयार उत्पादों को देश के विभिन्न शहरों में रहने वाले लोग अपने साथ लेकर जाते हैं। डीडीहाट और आसपास के गांवों के जो लोग देश के विभिन्न शहरों में काम कर रहे हैं, वह वर्ष में एक बार यहां आकर अचार, जूस, मुरब्बा जैसी सामग्री लेकर जाते हैं। सबसे अधिक मांग बुरांश के जूस की रहती है।