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पिथौरागढ़ के कुमौड़ गांव में होने लगी हिलजात्रा की तैयारी
Updated Wed, 30 Aug 2017 11:08 PM IST
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पिथौरागढ़। पिथौरागढ़ के कुमौड़ गांव में एक सितंबर को होने वाली हिलजात्रा की तैयारी शुरू हो गई है। अतीतकाल से चली आ रही इस लोक परंपरा के समय लखियाभूत का प्रदर्शन आकर्षण का केंद्र होता है। कुमौड़ में इस बार हिलजात्रा की जोरदार तैयारी चल रही है। हिलजात्रा के दिन लखियाभूत की उपासना और आराधना के लिए कुमौड़ के आसपास के गांवों के लोग एकत्र होंगे। इस उत्सव के लिए बाहरी शहरों में नौकरी करने वाले लोग भी घरों को आने लगे हैं। हर घर में उत्सव की तैयारी की जा रही है।
हिलजात्रा के आयोजन से पहले हर बार की तरह इस बार भी इस पर्व के समय पहने जाने वाले मुखौटों को रंगने और सजाने का काम शुरू हो गया है। कुमौड़ गांव के कुंडल सिंह महर, मोहन सिंह, राजेंद्र सिंह, नीरज सिंह, पवन सिंह आदि मुखौटों को सजाने और हिलजात्रा के कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों को सही करने में लगे हैं। पहले हिलजात्रा एक दिन का लोकोत्सव होता था। राज्य गठन के बाद इसे महोत्सव का दर्जा दिया गया है।
अब हिलजात्रा के दौरान दो दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। लखियाभूत के पात्र के चयन के लिए गांव के लोगों की बैठक होगी। इसमें मुख्य पात्र के साथ-साथ अन्य सहायक पात्रों का चयन भी कर दिया जाएगा।
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हिलजात्रा कृषि से जुड़ा हुआ उत्सव
हिलजात्रा विशुद्ध रूप से लोकनाट्य परंपरा है। इसमें एक ओर हिमालयी क्षेत्र के मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन होता है तो दूसरी ओर इसमें देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित जात्रा परंपरा का भी समावेश है। यह कृषि से जुड़ा उत्सव है। पहले जब लोगों के पास मनोरंजन के अन्य साधन नहीं थे, तब ऐसे लोकोत्सवों में जन भागीदारी बहुत ज्यादा होती थी। इतिहासकार बताते हैं कि कुमौड़ और पिथौरागढ़ जिले के कई गांवों में यह परंपरा दो सौ साल से ज्यादा पुरानी है। लोग सुख और समृद्धि की कामना के साथ ही कृषि से जुड़ी सारी गतिविधियों से लोगों को अभिनय के माध्यम से परिचित कराने का प्रयास करते हैं। बारिश के मौसम में पहाड़ पर चारों ओर हरियाली छा जाती है। फसलें लहलहाने लगती हैं। ऐसे में उत्सव मनाकर लोग स्वस्थ मनोरंजन करते हैं। इतिहासकार डा. राम सिंह का कहना है कि हिमालय के मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश, सिक्किम आदि प्रांतों में भी मुखौटा नृत्य की परंपरा है। लोग ऐतिहासिक पात्रों की नकल करते हैं। ठीक इसी तरह बंगाल में जात्रा की परंपरा है। वहां पर देवी-देवताओं की उपासना के समय यात्राएं की जाती हैं। वह कहते हैं कि हिलजात्रा एक ऐसा नाट्य उत्सव है जिसमें देवी-देवताओं की उपासना तथा स्वस्थ मनोरंजन दोनों का समावेश है। हिलजात्रा के समय लखियाभूत की उपासना के पीछे भी मंगल कामना का ध्येय छिपा होता है। ऐसा विश्वास है कि जब लखियाभूत खुश हो जाए तो गांव तथा क्षेत्र में किसी प्रकार की आपदा नहीं आती। डा. सिंह बताते हैं कि पिछले दो सौ साल में कभी भी यह परंपरा खंडित नहीं हुई। इसके प्रति लोगों का विश्वास और उमंग लगातार बढ़ता जा रहा है।
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हिलजात्रा के आयोजन से पहले हर बार की तरह इस बार भी इस पर्व के समय पहने जाने वाले मुखौटों को रंगने और सजाने का काम शुरू हो गया है। कुमौड़ गांव के कुंडल सिंह महर, मोहन सिंह, राजेंद्र सिंह, नीरज सिंह, पवन सिंह आदि मुखौटों को सजाने और हिलजात्रा के कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों को सही करने में लगे हैं। पहले हिलजात्रा एक दिन का लोकोत्सव होता था। राज्य गठन के बाद इसे महोत्सव का दर्जा दिया गया है।
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अब हिलजात्रा के दौरान दो दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। लखियाभूत के पात्र के चयन के लिए गांव के लोगों की बैठक होगी। इसमें मुख्य पात्र के साथ-साथ अन्य सहायक पात्रों का चयन भी कर दिया जाएगा।
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हिलजात्रा कृषि से जुड़ा हुआ उत्सव
हिलजात्रा विशुद्ध रूप से लोकनाट्य परंपरा है। इसमें एक ओर हिमालयी क्षेत्र के मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन होता है तो दूसरी ओर इसमें देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित जात्रा परंपरा का भी समावेश है। यह कृषि से जुड़ा उत्सव है। पहले जब लोगों के पास मनोरंजन के अन्य साधन नहीं थे, तब ऐसे लोकोत्सवों में जन भागीदारी बहुत ज्यादा होती थी। इतिहासकार बताते हैं कि कुमौड़ और पिथौरागढ़ जिले के कई गांवों में यह परंपरा दो सौ साल से ज्यादा पुरानी है। लोग सुख और समृद्धि की कामना के साथ ही कृषि से जुड़ी सारी गतिविधियों से लोगों को अभिनय के माध्यम से परिचित कराने का प्रयास करते हैं। बारिश के मौसम में पहाड़ पर चारों ओर हरियाली छा जाती है। फसलें लहलहाने लगती हैं। ऐसे में उत्सव मनाकर लोग स्वस्थ मनोरंजन करते हैं। इतिहासकार डा. राम सिंह का कहना है कि हिमालय के मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश, सिक्किम आदि प्रांतों में भी मुखौटा नृत्य की परंपरा है। लोग ऐतिहासिक पात्रों की नकल करते हैं। ठीक इसी तरह बंगाल में जात्रा की परंपरा है। वहां पर देवी-देवताओं की उपासना के समय यात्राएं की जाती हैं। वह कहते हैं कि हिलजात्रा एक ऐसा नाट्य उत्सव है जिसमें देवी-देवताओं की उपासना तथा स्वस्थ मनोरंजन दोनों का समावेश है। हिलजात्रा के समय लखियाभूत की उपासना के पीछे भी मंगल कामना का ध्येय छिपा होता है। ऐसा विश्वास है कि जब लखियाभूत खुश हो जाए तो गांव तथा क्षेत्र में किसी प्रकार की आपदा नहीं आती। डा. सिंह बताते हैं कि पिछले दो सौ साल में कभी भी यह परंपरा खंडित नहीं हुई। इसके प्रति लोगों का विश्वास और उमंग लगातार बढ़ता जा रहा है।