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प्रेमचंद की जयंती पर किया दो बैलों की कथा का मंचन
Updated Mon, 31 Jul 2017 11:31 PM IST
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प्रेमचंद की जयंती पर विभिन्न स्थानों में कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। रामलीला मैदान में कथा चौपाल का आयोजन कर कथा सम्राट प्रेमचंद की मशहूर कथा दो बैलों की कहानी का मंचन किया गया।
शुरुआत आरंभ स्टडी सर्किल के युवाओं ने गिरीश तिवारी गिर्दा के गीत-नदी समुंदर चूस रहे हो... से की। इसके बाद शुरू हुई परिचर्चा में विनोद उप्रेती ने प्रेमचंद के कथाकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि हीरा और मोती उग्र और नरम पंथ का प्रतीक है। कहानी में दोनों विचारों के अतिवाद के बजाय मिले-जुले प्रयास का संदेश है। गोविंद कफलिया ने कहा कि बैलों के माध्यम से लेखक ने सही मायनों में आजादी का अर्थ समझाने का प्रयास किया।
चिंतामणि जोशी ने कहा कि पौराणिक और धार्मिक साहित्य के दौर में प्रेमचंद एक ऐसा साहित्य लेकर आए, जो अपने समय से कहीं आगे प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से परिपूर्ण था। बाखली के संपादक गिरीश पांडे, राजीव जोशी, दिनेश भट्ट, रेनू पांडे, नूतन कृष्ण पांडे, सोमेश, कमलेश उप्रेती, विनोद बसेड़ा, प्रमोद जोशी नरेश पुनेठा, ललित पांडे, महेश पुनेठा, मुकुल भट्ट ने विचार रखे।
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एलएसएम राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर हुई गोष्ठी में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अजय शुक्ल ने कहा प्रेमचंद स्वतंत्रता आंदोलन के सर्जनात्मक नायक थे। भावना पाटनी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में वैकल्पिक समाज का सौंदर्य झलकता है। हिंदी परिषद की अध्यक्ष ज्योति खोलिया ने कहा कि प्रेमचंद स्त्री के दुख को वंचित जनों के दुख से जोड़ देते थे। राजकीय इंटर कालेज टोटानौला में दीवार पत्रिका नवांकुर के संपादक मंडल ने प्रेमचंद की जयंती पर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा, नीता अन्ना, पूनम, स्वाति ने प्रेमचंद विशेषांक का लोकार्पण किया। बबीता पांडे, आकांक्षा, शिक्षक राजेंद्र बिष्ट, संतोष पंत, कविता कापड़ी ने विचार रखे।
शुरुआत आरंभ स्टडी सर्किल के युवाओं ने गिरीश तिवारी गिर्दा के गीत-नदी समुंदर चूस रहे हो... से की। इसके बाद शुरू हुई परिचर्चा में विनोद उप्रेती ने प्रेमचंद के कथाकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि हीरा और मोती उग्र और नरम पंथ का प्रतीक है। कहानी में दोनों विचारों के अतिवाद के बजाय मिले-जुले प्रयास का संदेश है। गोविंद कफलिया ने कहा कि बैलों के माध्यम से लेखक ने सही मायनों में आजादी का अर्थ समझाने का प्रयास किया।
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चिंतामणि जोशी ने कहा कि पौराणिक और धार्मिक साहित्य के दौर में प्रेमचंद एक ऐसा साहित्य लेकर आए, जो अपने समय से कहीं आगे प्रगतिशील और वैज्ञानिक चेतना से परिपूर्ण था। बाखली के संपादक गिरीश पांडे, राजीव जोशी, दिनेश भट्ट, रेनू पांडे, नूतन कृष्ण पांडे, सोमेश, कमलेश उप्रेती, विनोद बसेड़ा, प्रमोद जोशी नरेश पुनेठा, ललित पांडे, महेश पुनेठा, मुकुल भट्ट ने विचार रखे।
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एलएसएम राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर हुई गोष्ठी में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अजय शुक्ल ने कहा प्रेमचंद स्वतंत्रता आंदोलन के सर्जनात्मक नायक थे। भावना पाटनी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में वैकल्पिक समाज का सौंदर्य झलकता है। हिंदी परिषद की अध्यक्ष ज्योति खोलिया ने कहा कि प्रेमचंद स्त्री के दुख को वंचित जनों के दुख से जोड़ देते थे। राजकीय इंटर कालेज टोटानौला में दीवार पत्रिका नवांकुर के संपादक मंडल ने प्रेमचंद की जयंती पर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा, नीता अन्ना, पूनम, स्वाति ने प्रेमचंद विशेषांक का लोकार्पण किया। बबीता पांडे, आकांक्षा, शिक्षक राजेंद्र बिष्ट, संतोष पंत, कविता कापड़ी ने विचार रखे।