पिथौरागढ़ में 60 स्कूलों के भवन जर्जर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले में बारिश, अंधड़ और खराब गुणवत्ता के कारण पिथौरागढ़ जिले में 60 प्राथमिक स्कूल भवन जर्जर हालत में पहुंच गए हैं। इन भवनों के लिए अब तक शासन से धनराशि नहीं मिली है। बारिश के मौसम में खतरे को देखते हुए अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। बेड़ीनाग विकासखंड के बौगाड़ में मई में स्कूल भवन की छत अंधड़ के दौरान क्षतिग्रस्त हो गई थी। अब इस स्कूल में बारिश के समय बच्चों के बैठने के लिए सुरक्षित जगह नहीं बची है। शिक्षा विभाग जर्जर भवनों और मरम्मत के योग्य भवनों की सूची तथा सर्वे कर हर साल जनवरी में शासन को भेज देता है। सात माह बीतने पर भी इन भवनों के लिए धनराशि नहीं मिली है। ताजा बारिश से भी कई स्कूल भवन खतरे की जद में आए हैं। हालांकि अभी इनका सर्वे शुरू नहीं हो पाया है। वहीं,
बेसिक शिक्षा विभाग पिथौरागढ़ के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल मानसून सीजन में 60 प्राथमिक स्कूल भवनों को खतरा पैदा हो गया था। इनमें से ज्यादातर भवनों की छत टूटना, आंगन की दीवार धंसना, दरवाजे और खिड़कियों की लकड़ी का सड़ना, फर्श में लगाया गया सीमेंट उखड़ना जैसी समस्याएं सामने आई। सर्व शिक्षा अभियान के इंजीनियर विमल पांडे के अनुसार यह सारा सर्वे मानसून सीजन की समाप्ति के बाद कर दिया गया।
जनवरी में सारे भवनों की रिपोर्ट तैयार कर शासन को भेजी गई। सर्व शिक्षा अभियान के तहत संचालित भवनों की मरम्मत के लिए धनराशि केंद्र सरकार से आती है। जिला शिक्षा अधिकारी शौकत अली ने बताया कि शासन के पास भवनों की मरम्मत के जो प्रस्ताव गए हैं, उनके लिए जल्दी धन मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि खतरनाक भवनों में बारिश के समय बच्चों को न बैठाने के लिए कहा गया है।
हर साल बढ़ता है जर्जर भवनों का आंकड़ा
बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि जर्जर भवनों का आंकड़ा हर साल बढ़ जाता है, लेकिन शासन से मरम्मत के लिए धन कुछ ही भवनों के लिए मिलता है। वर्ष 2015 में 40 भवन क्षतिग्रस्त हुए थे, लेकिन मरम्मत का पैसा सिर्फ 29 भवनों के लिए मिला। इन पर इस समय काम चल रहा है।
क्षेत्र समिति की बैठकों में उठता है मुद्दा
क्षेत्र पंचायत समिति की बैठकों में स्कूल भवनों के मामले हमेशा उठते रहते हैं। पंचायत प्रतिनिधि अपने इलाके के एक-दो भवनों की हालत का मुद्दा उठाते रहते हैं। समिति की बैठकों में इनके प्रस्ताव भी बनते हैं, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं होती। अधिकारी हमेशा बजट का रोना रोते रहते हैं।