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बरड़ गांव से दस साल में चले गए 37 परिवार

Thu, 02 Nov 2017 10:43 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
ब्यूरो/अमर उजाला, थल Updated Thu, 02 Nov 2017 10:43 PM IST
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37 families moved to Barad village in ten years
बरड़ गांव के कई घरों में इसी तरह पसरा है सन्नाटा - फोटो : अमर उजाला

थल बाजार से मात्र तीन किलोमीटर दूर स्थित बरड़ गांव पर भी पलायन की मार से अछूता नहीं है, जबकि गांव से 500 मीटर की दूरी पर अल्मोड़ा-डीडीहाट राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरता है और छह साल पहले जिला पंचायत ने गांव में सड़क भी पहुंचा दी, बावजूद इसके लोगों के गांव छोड़कर जाने का सिलसिला नहीं रुका।

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दस साल पहले तक बरड़ गांव में 55 परिवार रहते थे, लेकिन अब इनकी संख्या सिर्फ 18 रह गई है। गांव में जितने भी परिवार बचे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। सभी के चेहरे में उदासी का भाव दिखता है। कई मकान वर्षों से बंद पड़े हैं। आंगन में बच्चों की उछलकूद, गायों के रंभाने की आवाज बंद हो चुकी है। अलग उत्तराखंड राज्य की हकीकत को बयां करने वाले इस गांव को संपन्न लोगों ने अलविदा कह दिया है।
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बताया गया कि बरड़ गांव के इंजीनियर अशोक चंद वर्ष 2007 में फ्रांस चले गए। उनके बाद जनक चंद, प्रदीप चंद, राजेंद्र चंद का परिवार दिल्ली, रामीचंद का परिवार बनबसा, नकुल चंद का परिवार मुंबई, कैलाश चंद का परिवार पिथौरागढ़, अर्जुन चंद का परिवार खटीमा, दिनेश चंद का परिवार बरेली चला गया। लोगों के गांव छोड़कर जाने का यह क्रम यही नहीं थमा।
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इसके बाद भी सेना में कार्यरत और सेवानिवृत्त लोगों ने हल्द्वानी, खटीमा का रुख कर लिया। पिछले साल ही दो परिवार गांव छोड़कर हल्द्वानी चले गए। गांव में प्राथमिक से आगे की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। चिकित्सा की भी यहां कोई सुविधा नहीं है। खेती को हर साल जंगली जानवर उजाड़ देते हैं। एक चहल-पहल भरे और संपन्न गांव में अब सिर्फ खामोशी का आलम है। 

सरकार को गांवों में सुविधा बढ़ानी चाहिए
बरड़ निवासी हर्ष बहादुर चंद का कहना है कि सरकार को पहाड़ के गांवों में सुविधा बढ़ानी चाहिए। पलायन के असली कारणों को खोजने पर उसे रोका भी जा सकता है। पहाड़ पर मुख्य समस्या रोजगार की है। लोग रोजी-रोटी के लिए ही गांवों को छोड़ रहे हैं। यह गंभीर मामला है। 

गांव छोड़ चुके लोग वापस क्यों आएंगे
बरड़ निवासी कवींद्र चंद का कहना है कि जो लोग महानगरों में बस गए हैं वह वापस क्यों आएंगे। सरकार के स्तर से न तो उन लोगों को वापस लाने की पहल हुई और न जाने से रोकने का प्रयास हुआ। नई पीढ़ी के लोग तो किसी भी दशा में गांव वापस नहीं आना चाहते। 

गांव सिर्फ गरीबों के लिए ही रह गए
बरड़ गांव की बुजुर्ग रूपसी देवी का कहना है कि पहाड़ के गांव सिर्फ गरीबों के लिए रह गए हैं। यह समस्या सिर्फ बरड़ गांव में ही नहीं वरन अन्य गांवों में भी आ चुकी है। वह कहती हैं कि लोगों के गांव छोड़कर जाने में बड़ा दुख होता है। यह अच्छे लक्षण नहीं हैं।


कुछ परिवारों के साथ मजबूरी भी है
बरड़ निवासी गंगा देवी का कहना है कि कुछ परिवारों के साथ मजबूरी भी है। उनके पास संसाधन नहीं हैं। पैसे की कमी है। दूसरी जगह जमीन खरीदने और मकान बनाने के लिए पैसा चाहिए। इस कारण मजबूरी में पूरी जिंदगी गांव में ही कटनी पड़ेगी।

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