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25 किमी पैदल चलकर घायल को पहुंचाया अस्पताल
ब्यूरो/अमर उजाला, मदकोट/मुनस्यारी
Updated Fri, 19 Aug 2016 10:16 PM IST
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तोमिक गांव के घायल आनंद सिंह को अस्पताल पहुंचाने में मदद करती महिलाएं
- फोटो : जगदीश उप्रेती
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मदकोट-बोना मार्ग बंद होने से इलाके के लोगों की मुसीबत बढ़ती जा रही है। बीमारों को अस्पताल पहुंचाने में लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। शुक्रवार को तोमिक गांव निवासी भगत सिंह के बेटे आनंद सिंह (24) को कुर्सी पर बैठाकर 25 किमी पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया जा सका। उसके पैर पर चोट लग गई थी। गांव में पुरुषों के काम के लिए इधर-उधर होने के चलते महिलाओं ने आनंद को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। उसे अस्पताल पहुंचाने में पूरे नौ घंटे लगे।
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मदकोट-बोना मार्ग की हालत इतनी खराब है कि उसमें पैदल चल पाना संभव नहीं है। लोग बमुश्किल इस पैदल मार्ग पर आवागमन कर पा रहे हैं। सर्वाधिक दिक्कत मरीजों के लिए हो रही है। 17 अगस्त को जंगल में फिसलने से आनंद सिंह के पैर पर चोट आ गई थी। उसे तत्काल अस्पताल ले जाना जरूरी था। गांव में पुरुषों के न होने से महिलाएं इस काम के लिए आगे आई।
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गांव में मरीजों को लाने-जे जाने के लिए डोली तक उपलब्ध नहीं है, लिहाजा महिलाओं ने कुर्सी के अगल-बगल में डंडे फंसाकर उसे डोली का आकार दिया और उसमें आनंद को बैठाकर मुख्य सड़क के बजाए जंगल के पैदल रास्ते से मदकोट अस्पताल ले जाने के लिए निकल पड़े। पूरे नौ घंटे बाद अपरान्ह तीन बजे आनंद को मदकोट अस्पताल पहुंचाया गया। आनंद को शुक्रवार को अस्पताल में ही रखा गया है। पैर पर प्लास्टर चढ़ाने की जरूरत पड़ी तो उसे जिला अस्पताल ले जाना पड़ेगा।
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गांव के प्रह्लाद सिंह तोमक्याल ने बताया कि ऐसी विपदा कभी नहीं झेली। मदकोट-बोना सड़क को खोलने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है। सड़क ढाई महीने से बंद पड़ी है। इस सड़क पर इतना मलबा पटा है कि पैदल चलने लायक भी नहीं रह गया है। गांव की आनंदी देवी, द्रोपदी देवी, कमला देवी ने घायल आनंद को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। कई जगह इन महिलाओं ने युवक के लिए बनाई गई डोली को कंधा दिया।
इसके अलावा गांव के गणेश सिंह, नैन सिंह, मोहन सिंह, सुंदर सिंह ने भी युवक को अस्पताल लाने में मदद की। स्थानीय लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र होने के बाद भी अधिकारी व्यवस्थाएं सुधारने में कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। बार-बार मुसीबत में पड़ रहे लोगों की समस्या को सुनने वाला कोई नहीं है। एक माह के भीतर गांव वाले तीन बीमारों को 25 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर अस्पताल पहुंचा चुके हैं।