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पिथौरागढ़ जिले में सूखे से 35 फीसदी फसल बर्बाद
Updated Wed, 17 Jan 2018 10:49 PM IST
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पिथौरागढ़। 24 सितंबर से अब तक बारिश न होने के कारण जिले में गेहूं, जौ, मसूर, चना, सरसों की फसल का 35 फीसदी हिस्सा बर्बाद हो गया है। हालांकि, सूखे की स्थिति पर अब तक शासन ने कोई सर्वे नहीं कराया है। इस कारण जिला प्रशासन ने भी अपने स्तर से कोई कदम नहीं उठाया है। प्रशासन इसी तैयारी में है कि यदि सरकार सर्वे का निर्देश दे तो शीघ्र कदम उठाया जाए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में इस बार 26331 हेक्टेयर में गेहूं की फसल बोई गई है। अधिकांश किसानों ने कृषि विभाग से उन्नत प्रजाति का बीज खरीदकर बोया है। गेहूं की इस फसल में से मात्र 2757 हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा है। ज्यादातर फसल को वर्षा के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। गेहूं की फसल 35 प्रतिशत तक बर्बाद हो गई है। इसी तरह जिले में जौ की फसल 3537 हेक्टेयर में बोई गई है। इसमें से मात्र 40 हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। जौ का उत्पादन लोग जानवरों के चारे और बीजों को पूजा-पाठ में लाने के लिए करते हैं। जौ हालांकि मुख्य फसल नहीं है, लेकिन इसका महत्व काफी है।
जौ की फसल पर भी 30 से 35 प्रतिशत तक असर पड़ा है। मसूर की फसल का क्षेत्र 4442 हेक्टेयर है। इसमें से मात्र 428 हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। मसूर का महत्व सबसे ज्यादा है। कई परिवार तो सालभर के लिए दाल की व्यवस्था करने के बाद उसकी बिक्री भी करते आए हैं। इस बार मसूर का उत्पादन प्रभावित होने की पूरी आशंका है। इससे पहाड़ के गरीब किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। अपर जिलाधिकारी मोहम्मद नासिर ने कहा कि अभी शासन से सूखे का सर्वे कराने संबंधी आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलते ही सर्वे शुरू कर दिया जाएगा।
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सब्जियों पर पड़ा पाले का असर
जिले में शीतकाल में लाही, पालक, मेथी, धनिया जैसी सब्जियों का उत्पादन किया जाता है। कुल 642 हेक्टेयर में इन सब्जियों को बोया जाता है, लेकिन बारिश की कमी से और पाला गिरने से सब्जियों का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। वैसे तो सब्जियों को उन स्थानों पर ही ज्यादा मात्रा में बोया जाता है, जहां पर पानी की सुविधा हो, लेकिन बारिश न होने से पानी के स्रोतों में पानी कम होने लगा है।
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार जिले में इस बार 26331 हेक्टेयर में गेहूं की फसल बोई गई है। अधिकांश किसानों ने कृषि विभाग से उन्नत प्रजाति का बीज खरीदकर बोया है। गेहूं की इस फसल में से मात्र 2757 हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा है। ज्यादातर फसल को वर्षा के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। गेहूं की फसल 35 प्रतिशत तक बर्बाद हो गई है। इसी तरह जिले में जौ की फसल 3537 हेक्टेयर में बोई गई है। इसमें से मात्र 40 हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। जौ का उत्पादन लोग जानवरों के चारे और बीजों को पूजा-पाठ में लाने के लिए करते हैं। जौ हालांकि मुख्य फसल नहीं है, लेकिन इसका महत्व काफी है।
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जौ की फसल पर भी 30 से 35 प्रतिशत तक असर पड़ा है। मसूर की फसल का क्षेत्र 4442 हेक्टेयर है। इसमें से मात्र 428 हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। मसूर का महत्व सबसे ज्यादा है। कई परिवार तो सालभर के लिए दाल की व्यवस्था करने के बाद उसकी बिक्री भी करते आए हैं। इस बार मसूर का उत्पादन प्रभावित होने की पूरी आशंका है। इससे पहाड़ के गरीब किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। अपर जिलाधिकारी मोहम्मद नासिर ने कहा कि अभी शासन से सूखे का सर्वे कराने संबंधी आदेश नहीं मिला है। आदेश मिलते ही सर्वे शुरू कर दिया जाएगा।
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सब्जियों पर पड़ा पाले का असर
जिले में शीतकाल में लाही, पालक, मेथी, धनिया जैसी सब्जियों का उत्पादन किया जाता है। कुल 642 हेक्टेयर में इन सब्जियों को बोया जाता है, लेकिन बारिश की कमी से और पाला गिरने से सब्जियों का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। वैसे तो सब्जियों को उन स्थानों पर ही ज्यादा मात्रा में बोया जाता है, जहां पर पानी की सुविधा हो, लेकिन बारिश न होने से पानी के स्रोतों में पानी कम होने लगा है।