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सड़क निर्माण से निकला मलबा बन रहा आपदा का कारण
Updated Sun, 22 Jul 2018 10:56 PM IST
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मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। इस माह की आपदा के लिए लोग सड़क निर्माण एजेंसियोें को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सड़क निर्माण के मलबे ने तबाही मचाई है। इस आपदा को मानव जनित आपदा के रूप में देखा जा रहा है। दो जुलाई को आई आपदा को आज 21 दिन हो गए हैं।
बीआरओ, लोनिवि सहित सड़क निर्माण में लगी कार्यदायी संस्था कभी भी नियमानुसार कार्य नहीं करती। मोटर मार्गों के निर्माण से निकले मलबे को डंपिंग जोन में डालने का प्रावधान है। इसके लिए कार्यदायी संस्था ठेकेदारों को लाखों रुपये का भुगतान करती है, लेकिन मलबे को सड़क से नीचे गिरा दिया जाता है। वर्ष 2013 की आपदा में भी यह बात प्रमुख रूप से सामने आई थी कि सड़क निर्माण और विद्युत परियोजनाओं का मलबा नदी में फेंकने से ज्यादा नुकसान हुआ।
मुनस्यारी-जौलजीबी मार्ग की कटिंग से निकले मलबे ने शंखधूरा, गर्घनिया, बलौटा, मिनलगांव, पतोती, रांथी, दरकोट, सेलापानी, चरखम गांव के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर दिया है। बीआरओ ने पानी निकासी के लिए न नाली बनाई और न कटिंग से खतरे में आ रहे गांवों को बचाने के लिए दीवार ही बनाई। यही हाल लोनिवि और पीएमजीएसवाई का भी रहा है।
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इन तीनों कार्यदायी संस्थाओं ने स्क्रबरों का निर्माण ऐसे स्थानों पर किया है, जहां आबादी रहती है। इतनी तबाही के बाद भी मलबे को सड़क किनारे या फिर नीचे फेंक कर नई आपदा को आमंत्रण दिया जा रहा है।
लोगों ने बीआरओ को ठहराया जिम्मेदार
रांथी निवासी आपदा प्रभावित गोविंद राम का कहना है कि बीआरओ ने स्क्रबर की निकासी उनके घर के ऊपर कर दी, जिससे उनके घर को नुकसान पहुंचा। बलौंता निवासी लवराज रावत ने बताया कि बीआरओ के सड़क निर्माण का सारा मलबा उनके खेतों में डाल दिया गया है। सौ मीटर के दायरे में 5 कलवर्ट बनाए गए हैं। मिनलगांव के दुर्गा राम का कहना है कि यदि समय रहते बीआरओ ने दीवार निर्माण कराई होती तो आज उनके गांव के 6 परिवारों के 31 सदस्यों को आपदा राहत शिविर में शरण नहीं लेनी पड़ती। सेलपानी निवासी गणेश भट्ट के अनुसार लोनिवि ने उसकी एक नहीं सुनी। एक घर को छोड़कर उसने दूसरा घर बनाया वह भी खतरे की जद में आ गया है। जलथ, गोरीपार, हरकोट, जोशा, चौना, गोलमा, रिंगू, चुलकोट, साना, डोबरी, देवीबगड़, गैला, राप्ती, वल्थी, रोपड़ सहित दर्जनों गांव सड़क निर्माण के मलबे और गलत स्थान पर पानी निकासी के लिए बनाए गए कलवर्टों से आपदा की जद में आ चुके हैं। सरकार और कार्यदायी संस्था नहीं चेती तो आपदा आती रहेगी।
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बीआरओ, लोनिवि सहित सड़क निर्माण में लगी कार्यदायी संस्था कभी भी नियमानुसार कार्य नहीं करती। मोटर मार्गों के निर्माण से निकले मलबे को डंपिंग जोन में डालने का प्रावधान है। इसके लिए कार्यदायी संस्था ठेकेदारों को लाखों रुपये का भुगतान करती है, लेकिन मलबे को सड़क से नीचे गिरा दिया जाता है। वर्ष 2013 की आपदा में भी यह बात प्रमुख रूप से सामने आई थी कि सड़क निर्माण और विद्युत परियोजनाओं का मलबा नदी में फेंकने से ज्यादा नुकसान हुआ।
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मुनस्यारी-जौलजीबी मार्ग की कटिंग से निकले मलबे ने शंखधूरा, गर्घनिया, बलौटा, मिनलगांव, पतोती, रांथी, दरकोट, सेलापानी, चरखम गांव के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर दिया है। बीआरओ ने पानी निकासी के लिए न नाली बनाई और न कटिंग से खतरे में आ रहे गांवों को बचाने के लिए दीवार ही बनाई। यही हाल लोनिवि और पीएमजीएसवाई का भी रहा है।
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इन तीनों कार्यदायी संस्थाओं ने स्क्रबरों का निर्माण ऐसे स्थानों पर किया है, जहां आबादी रहती है। इतनी तबाही के बाद भी मलबे को सड़क किनारे या फिर नीचे फेंक कर नई आपदा को आमंत्रण दिया जा रहा है।
लोगों ने बीआरओ को ठहराया जिम्मेदार
रांथी निवासी आपदा प्रभावित गोविंद राम का कहना है कि बीआरओ ने स्क्रबर की निकासी उनके घर के ऊपर कर दी, जिससे उनके घर को नुकसान पहुंचा। बलौंता निवासी लवराज रावत ने बताया कि बीआरओ के सड़क निर्माण का सारा मलबा उनके खेतों में डाल दिया गया है। सौ मीटर के दायरे में 5 कलवर्ट बनाए गए हैं। मिनलगांव के दुर्गा राम का कहना है कि यदि समय रहते बीआरओ ने दीवार निर्माण कराई होती तो आज उनके गांव के 6 परिवारों के 31 सदस्यों को आपदा राहत शिविर में शरण नहीं लेनी पड़ती। सेलपानी निवासी गणेश भट्ट के अनुसार लोनिवि ने उसकी एक नहीं सुनी। एक घर को छोड़कर उसने दूसरा घर बनाया वह भी खतरे की जद में आ गया है। जलथ, गोरीपार, हरकोट, जोशा, चौना, गोलमा, रिंगू, चुलकोट, साना, डोबरी, देवीबगड़, गैला, राप्ती, वल्थी, रोपड़ सहित दर्जनों गांव सड़क निर्माण के मलबे और गलत स्थान पर पानी निकासी के लिए बनाए गए कलवर्टों से आपदा की जद में आ चुके हैं। सरकार और कार्यदायी संस्था नहीं चेती तो आपदा आती रहेगी।