{"_id":"5b8ec857867a55483d34b03b","slug":"121536084055-pithoragarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बच्चों के लिए नाई तक बन जाते हैं शिक्षक रमेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बच्चों के लिए नाई तक बन जाते हैं शिक्षक रमेश
Updated Tue, 04 Sep 2018 11:30 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
डीडीहाट (पिथौरागढ़)। अधिकतर शिक्षक जहां दुर्गम स्कूलों में जाने से कतराते हैं, वहीं कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं, जिन्होंने दुर्गम स्थलों को अपनी कर्मस्थली बनाकर गरीब बच्चों की शिक्षा का बीड़ा उठाया। इन्हीं शिक्षकों में धारचूला के जाराजिबली प्राथमिक स्कूल में कार्यरत रमेश चंद्र जोशी सत्यम भी शामिल हैं। रमेश गांव के बच्चों को केवल पढ़ाते ही नहीं, बल्कि उनके लिए नाई तक बन जाते हैं।
डीडीहाट के रहने वाले शिक्षक रमेश चंद्र जोशी पुत्र चंद्रबल्लभ जोशी की तैनाती पांच वर्ष पहले धारचूला विकासखंड के अंतिम गांव जाराजिबली में हुई थी। तब से रमेश जोशी ने इसी स्कूल को अपनी कर्मस्थली बना लिया। पांच वर्षों से वह न केवल गांव के गरीब बच्चों पढ़ा रहे हैं, बल्कि अन्य शिक्षकों के सहयोग से उनके लिए ड्रेस, जूते, मोजे तक उपलब्ध कराते हैं। सरकारी स्कूल के इन बच्चों को उन्होंने टाई बांधना भी सिखाया। इस गांव में नाई नहीं है। बाल काटने के लिए गांव के लोगों को 12 किमी दूर दूसरे कस्बे में जाना पड़ता है।
ऐसे में शिक्षक रमेश बच्चों के लिए खुद नाई बन जाते हैं। जिन बच्चों के बाल बड़े नजर आए इंटरवल या छुट्टी के बाद उन्हें बैठाकर स्वयं बाल काटते हैं। यहां तक कि बच्चों के नाखून भी स्वयं काटते हैं। वर्तमान में दुर्गम के इस स्कूल की छात्रसंख्या 53 है। स्कूल की दीवारों पर चित्र बनाकर कथाएं लिखी हैं। बच्चों की हस्तलिखित पत्रिका बाल मन भी स्कूल में नियमित निकाली जाती है। बच्चों को कंप्यूटर का ज्ञान भी कराते हैं।
विज्ञापन
शिक्षक रमेश जोशी का समर्पण इसी से नजर आता है कि वह गांव में स्थित हाईस्कूल के बच्चों को सुबह आठ से नौ बजे तक गणित और विज्ञान भी निशुल्क पढ़ाते हैं। उन्होंने स्कूल में क्वैराल के 200 पौधों की नर्सरी भी बनाई है।
विज्ञापन
डीडीहाट के रहने वाले शिक्षक रमेश चंद्र जोशी पुत्र चंद्रबल्लभ जोशी की तैनाती पांच वर्ष पहले धारचूला विकासखंड के अंतिम गांव जाराजिबली में हुई थी। तब से रमेश जोशी ने इसी स्कूल को अपनी कर्मस्थली बना लिया। पांच वर्षों से वह न केवल गांव के गरीब बच्चों पढ़ा रहे हैं, बल्कि अन्य शिक्षकों के सहयोग से उनके लिए ड्रेस, जूते, मोजे तक उपलब्ध कराते हैं। सरकारी स्कूल के इन बच्चों को उन्होंने टाई बांधना भी सिखाया। इस गांव में नाई नहीं है। बाल काटने के लिए गांव के लोगों को 12 किमी दूर दूसरे कस्बे में जाना पड़ता है।
विज्ञापन
ऐसे में शिक्षक रमेश बच्चों के लिए खुद नाई बन जाते हैं। जिन बच्चों के बाल बड़े नजर आए इंटरवल या छुट्टी के बाद उन्हें बैठाकर स्वयं बाल काटते हैं। यहां तक कि बच्चों के नाखून भी स्वयं काटते हैं। वर्तमान में दुर्गम के इस स्कूल की छात्रसंख्या 53 है। स्कूल की दीवारों पर चित्र बनाकर कथाएं लिखी हैं। बच्चों की हस्तलिखित पत्रिका बाल मन भी स्कूल में नियमित निकाली जाती है। बच्चों को कंप्यूटर का ज्ञान भी कराते हैं।
विज्ञापन
शिक्षक रमेश जोशी का समर्पण इसी से नजर आता है कि वह गांव में स्थित हाईस्कूल के बच्चों को सुबह आठ से नौ बजे तक गणित और विज्ञान भी निशुल्क पढ़ाते हैं। उन्होंने स्कूल में क्वैराल के 200 पौधों की नर्सरी भी बनाई है।