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Pauri News: उत्तराखंड का हिसालू, सेहत और स्थानीय अर्थव्यवस्था का नया आधार
Fri, 08 May 2026 07:15 PM IST
देहरादून ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
Updated Fri, 08 May 2026 07:15 PM IST
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उत्तराखंड का हिसालू, सेहत और स्थानीय अर्थव्यवस्था का नया आधार
- जंगलों का हिसालू अब बन सकता है स्वास्थ्य उद्योग का हिस्सा, वैज्ञानिकों के शोध में हुआ खुलासा
शोध की महत्वपूर्ण खबर है।
मुकेश चंद्र आर्य
पौड़ी। हिसालू (रुबस इलिप्टिकस) स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी माना जा रहा है। अप्रैल-मई में हिमालयी जंगलों में मिलने वाले इस फल पर हुए वैज्ञानिक शोध में इसके शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट और पोषक गुणों का खुलासा हुआ है। शोध को कई प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित किया गया है। अध्ययनों के अनुसार हिसालू में पॉलीफेनॉल, फ्लेवोनॉयड, कैरोटिनॉयड और टैनिन जैसे जैव सक्रिय तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इसके अलावा इसमें विटामिन-सी, आहारीय रेशा और लौह तत्व भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन तंत्र को मजबूत करने में सहायता मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिसालू अब केवल जंगली फल नहीं, बल्कि पोषक-औषधीय उत्पाद और टिकाऊ संसाधन के रूप में उभर रहा है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर ध्यान दिया जाए तो यह उत्तराखंड की स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती दे सकता है।
व्यावसायिक उपयोग की चुनौतियां
- विशेषज्ञ बताते हैं कि हिसालू सीमित अंतराल में फलने वाला मौसमी रसबेरी है, जो कि लंबे समय तक ताजा नहीं रह पाता है। जल्दी खराब होने की वजह से इसका बड़े स्तर पर विपणन कठिन हो जाता है। ऐसे में इसके संरक्षण के लिए शीत-शुष्क संरक्षण तकनीक (फ्रीज ड्राइंग) जैसी आधुनिक विधियां उपयोगी साबित हो सकती हैं, जिनसे इसके पोषक तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
कई खनिजों से भरपूर है हिसालू
वैज्ञानिकों ने फाइटोकेमिकल स्क्रीनिंग में पाया कि हिसालू के फलों में विभिन्न प्रकार के जैव सक्रिय तत्व मौजूद हैं। जिसमें कार्बोहाइड्रेट, एल्कलॉइड (औषधीय पौधों में मिलने वाले सक्रिय यौगिक) सैपोनिन (रोग प्रतिरोधक क्षमता व अन्य जैविक प्रभावों से जुड़े यौगिक), टैनिन (एंटीऑक्सीडेंट गुणों वाला तत्व), फ्लेवोनॉइड (कोशिकाओं को नुकसान से बचाने वाले शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट), ट्राइटरपेनॉइड (सूजन रोधी व अन्य जैविक गतिविधियों वाले यौगिक) शामिल हैं। साथ ही इसमें विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आयरन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं।
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- कई रोगाें का मर्ज है हिसालू
अध्ययन में बताया गया है कि हिसालू में मधुमेह नियंत्रण, सूजन कम करने, संक्रमण रोकने, घाव भरने और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधियों जैसी औषधीय संभावनाएं देखी गई हैं। पारंपरिक रूप से उत्तराखंड, नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों में इसके फल, पत्तियां और जड़ें पेट संबंधी समस्याओं, बुखार, घाव और अन्य रोगों में उपयोग की जाती रही हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
- हिसालू पर कई प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों ने शोध किया है। इन्हें जर्नल ऑफ फूड सांइस एंड टेक्नोलॉजी, जर्नल ऑफ हर्बल मेडिसिन, जर्नल ऑफ आयुर्वेद एंड इंटेग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिक तकनीक व सही योजना बनाकर इसका उपयोग जनहित में किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को स्वरोजगार भी मिलेगा। डॉ. ममता बौंठियाल, डीन (आरएंडडी), जीबीपीआईईटी घुड़दौड़ी, पौड़ी गढ़वाल।
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- जंगलों का हिसालू अब बन सकता है स्वास्थ्य उद्योग का हिस्सा, वैज्ञानिकों के शोध में हुआ खुलासा
शोध की महत्वपूर्ण खबर है।
मुकेश चंद्र आर्य
पौड़ी। हिसालू (रुबस इलिप्टिकस) स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी माना जा रहा है। अप्रैल-मई में हिमालयी जंगलों में मिलने वाले इस फल पर हुए वैज्ञानिक शोध में इसके शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट और पोषक गुणों का खुलासा हुआ है। शोध को कई प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित किया गया है। अध्ययनों के अनुसार हिसालू में पॉलीफेनॉल, फ्लेवोनॉयड, कैरोटिनॉयड और टैनिन जैसे जैव सक्रिय तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इसके अलावा इसमें विटामिन-सी, आहारीय रेशा और लौह तत्व भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन तंत्र को मजबूत करने में सहायता मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिसालू अब केवल जंगली फल नहीं, बल्कि पोषक-औषधीय उत्पाद और टिकाऊ संसाधन के रूप में उभर रहा है। इसके वैज्ञानिक अध्ययन, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर ध्यान दिया जाए तो यह उत्तराखंड की स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती दे सकता है।
व्यावसायिक उपयोग की चुनौतियां
- विशेषज्ञ बताते हैं कि हिसालू सीमित अंतराल में फलने वाला मौसमी रसबेरी है, जो कि लंबे समय तक ताजा नहीं रह पाता है। जल्दी खराब होने की वजह से इसका बड़े स्तर पर विपणन कठिन हो जाता है। ऐसे में इसके संरक्षण के लिए शीत-शुष्क संरक्षण तकनीक (फ्रीज ड्राइंग) जैसी आधुनिक विधियां उपयोगी साबित हो सकती हैं, जिनसे इसके पोषक तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
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कई खनिजों से भरपूर है हिसालू
वैज्ञानिकों ने फाइटोकेमिकल स्क्रीनिंग में पाया कि हिसालू के फलों में विभिन्न प्रकार के जैव सक्रिय तत्व मौजूद हैं। जिसमें कार्बोहाइड्रेट, एल्कलॉइड (औषधीय पौधों में मिलने वाले सक्रिय यौगिक) सैपोनिन (रोग प्रतिरोधक क्षमता व अन्य जैविक प्रभावों से जुड़े यौगिक), टैनिन (एंटीऑक्सीडेंट गुणों वाला तत्व), फ्लेवोनॉइड (कोशिकाओं को नुकसान से बचाने वाले शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट), ट्राइटरपेनॉइड (सूजन रोधी व अन्य जैविक गतिविधियों वाले यौगिक) शामिल हैं। साथ ही इसमें विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आयरन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं।
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- कई रोगाें का मर्ज है हिसालू
अध्ययन में बताया गया है कि हिसालू में मधुमेह नियंत्रण, सूजन कम करने, संक्रमण रोकने, घाव भरने और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधियों जैसी औषधीय संभावनाएं देखी गई हैं। पारंपरिक रूप से उत्तराखंड, नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों में इसके फल, पत्तियां और जड़ें पेट संबंधी समस्याओं, बुखार, घाव और अन्य रोगों में उपयोग की जाती रही हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
- हिसालू पर कई प्रतिष्ठित संस्थानों के वैज्ञानिकों ने शोध किया है। इन्हें जर्नल ऑफ फूड सांइस एंड टेक्नोलॉजी, जर्नल ऑफ हर्बल मेडिसिन, जर्नल ऑफ आयुर्वेद एंड इंटेग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिक तकनीक व सही योजना बनाकर इसका उपयोग जनहित में किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को स्वरोजगार भी मिलेगा। डॉ. ममता बौंठियाल, डीन (आरएंडडी), जीबीपीआईईटी घुड़दौड़ी, पौड़ी गढ़वाल।