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Nainital: नैनीझील-नौकुचियाताल झील आईसीयू में...बाकि दो का भी बढ़ रहा मर्ज, सातताल के श्वांस की टूट रही डोर

Mon, 19 May 2025 11:10 AM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: हीरा मेहरा Updated Mon, 19 May 2025 11:10 AM IST
सार

भीमताल और सातताल की झीलें प्राकृतिक रूप से पारिस्थितिकी तंत्र को दुरुस्त करने की क्षमता खो चुकी हैं। इससे झीलों के अस्तित्व पर संकट आ खड़ा है। भीमताल व सातताल झील में लगभग खत्म हो चुका ऑक्सीजन स्तर इसका प्रमाण है। 

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Water level in Naini lake and Naukuchiatal is at surface
नौकुचियाताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मेरी सांसों के रसातल पर जाने की शुरुआत काफी पहले मेरे रसातल से ही हुई। अब तलहटी पर मुझे मार चुका लगवा सतह पर आने की जिद के चलते मेरा अस्तित्व लीलने पर आमादा है। थोड़ा बहुत मेरी सांसें बस सतह पर ही हैं। मेरा अस्तित्व खुद ही मेरी गहराइयों में ही कहीं खोने की ओर है, जिसे बचाने की कहीं कोई हलचल भी नहीं है। ऐसे में मेरे भीतर दूसरों को जीवन देने का भी कोई लक्षण अब नहीं है। मेरा शरीर आपको दिख रहा है, मगर मेरी आत्मा धीरे-धीरे मरने की ओर है। आत्मा यानि मेरी प्राण रूपी ऑक्सीजन, जो लगभग खत्म हो चुकी है। सतह से लेकर तलहटी तक कहीं अब इस प्राण वायु का ठिकाना नहीं है। कुछ दिनों बाद जब यह प्राण वायु पूरी तरह खत्म हो जाएगी तब मेरे भीतर मौजूद मछलियां भी लगभग मृत होकर इसी प्राण वायु की तलाश में सतह पर आएंगी। मगर उन्हें कुछ नहीं मिलेगा, सिर्फ बिना ऑक्सीजन की झील में असमय मृत्यु के। ऐसा नैनीताल में तो आपने देखा ही था। अब यह सब घटित होगा मेरे साथ भी क्योंकि मेरी गहराई का 90 फीसदी हिस्सा बिना प्राण वायु के मृत है। शरीर का दस प्रतिशत हिस्सा किसी तरह जीवित तो है...मगर वेंटिलेटर में पड़े किसी मरीज की तरह...।

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यह दारुण व्यथा है झीलों की नगरी नैनीताल के पास स्थित प्रसिद्ध भीमताल और सातताल की। नैनीताल के बाद अब यह झीलें भी प्राकृतिक रूप से पारिस्थितिकी तंत्र को दुरुस्त करने की क्षमता खो चुकी हैं। इससे झीलों के अस्तित्व पर संकट आ खड़ा है। भीमताल व सातताल झील में लगभग खत्म हो चुका ऑक्सीजन स्तर इसका प्रमाण है। नैनीताल और नौकुचियाताल झीलों में एयरेशन का काम देख रही ग्लोब एक्वा कंपनी के मुताबिक भीमताल में तलहटी पर ऑक्सीजन शून्य, सतह पर 4.99 मिग्री प्रति लीटर और सातताल में तलहटी पर 0.50 और सतह पर मात्र 4.02 मिग्रा प्रति लीटर है। ऑक्सीजन की मौजूदगी भी सतह से नीचे केवल एक मीटर तक ही है। भीमताल झील की गहराई 15 और सातताल की 18 मीटर है। इस लिहाज से तलहटी से भीमताल 14 और सातताल 17 मीटर ऊंचाई तक शून्य ऑक्सीजन के चलते मृत हो चुकी है।

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ऑक्सीजन की अनुपस्थिति खतरनाक
झील की सतह में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति जलीय जीवन के लिए खतरनाक है। यह झील के पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर सकती है। झील में ऑक्सीजन की कमी कम या अनुपलब्ध जलीय जीवों के लिए जानलेवा है। झीलों में सामान्यता ऑक्सीजन का स्तर 6.5-8 मिग्रा प्रति लीटर होना जरूरी है। मगर यहां यह शून्य तक पहुंच चुका है।

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नैनीताल, नौकुचियाताल कृत्रिम सांस पर जीवित
अनियोजित नगरीकरण, भार क्षमता का ताक पर रखकर हो रहे निर्माण, बढ़ते पर्यटन के कारण, लगभग 18 वर्षों से नैनीझील कृत्रिम सांस के माध्यम से आईसीयू में है। नौकुचियाताल भी 12 वर्षों से कृत्रिम सांस पर है। हालात बिगड़ने पर 18 सितंबर 2007 को एयरेशन के माध्यम से नैनीझील को ऑक्सीजन देकर पुनर्जीवित किया गया। इसका ऑक्सीजन पाइप यानी श्वास नली वर्ष 2013 में अपनी आयु पूरी कर चुकी है जबकि फेफड़े (फ्लोमीटर) वर्ष 2017 में आयु पूरी कर चुके हैं, लेकिन इसके सुधार की अब तक पहल शुरू नहीं हो पाई है।

झीलों में पानी का स्तर सतह (मिग्रा प्रति लीटर में)

झील                         सतह पर             तलहटी पर

नैनीझील                         9.08             5.97

नौकुचियाताल                 9.32             6.00

भीमताल                         4.99             00

सातताल                         4.02             0.50

कोट

झील का डिजाॅल्व ऑक्सीजन स्तर चार से ऊपर होना चाहिए। नैनीताल और नौकुचियाताल में तो यह सतह से तलहटी तक ठीक है, लेकिन भीमताल व सातताल में सतह के लगभग एक मीटर नीचे झील लगभग मृत हो चुकी है। - आनंद कोरंगा प्रोजेक्ट मैनेजर ग्लोबल एक्वा।

वर्ष 1995 में मैंने झील व नगर नियोजन को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी ताकि यहां की झीलें प्राकृतिक रूप से समृद्ध हों, लेकिन दो झीलें कृत्रिम सांस पर हैं, शेष के भविष्य के लिए कहीं कोई चिंता नजर नहीं आती। नैनीताल तहसील को षष्ट खात (छखाता) के रूप में इसीलिए जाना जाता था कि नैनीताल व आसपास 60 झीलें व वेटलैंड थे। अनियोजित निर्माण से वेटलैंड खत्म हो गए हैं। झीलों के सुरक्षित भविष्य के लिए इन्हें भी बचाने के लिए प्रभावी पहल करनी होगी। - प्रो. अजय रावत, पर्यावरणविद



अनियोजित नगरीकरण, भार क्षमता के अनुरूप नियोजन की कमी, कूड़ा प्रबंधन न होना, झील में कचरे आदि के पहुंचने से बढ़ रही बसासत व बेलगाम पर्यटन के क्रम में झीलें मृत हो रही हैं। आईसीयू में रखने की बजाय पहले प्राकृतिक रूप से झीलों के पुनर्जीवन की जरूरत है। बहुत आवश्यक होने पर कृत्रिम सांस से उन्हें जीवित करना होगा, अन्यथा झीलों का अस्तित्व खत्म होने से नहीं रोका जा सकता। - प्रो. पीसी तिवारी, ग्लेशियर व प्राकृतिक जल स्रोतों के शोधकर्ता

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