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Uttarakhand Nikay Chunav: मेयर सीट पर आरक्षण बदल भाजपा ने साधे एक तीर से दो निशाने, जानिए कैसे?

Tue, 24 Dec 2024 11:26 AM IST
हीरा मेहरा चंद्रेश पांडेय, अमर उजाला
चंद्रेश पांडेय, अमर उजाला Published by: हीरा मेहरा Updated Tue, 24 Dec 2024 11:26 AM IST
सार

हल्द्वानी में सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या अधिक है, मेयर की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित कराकर भाजपा खुद ही अपने जाल में फंस गई थी। उसे लगा सामान्य वर्ग के मतदाता नाराज हो सकते हैं। इसका असर 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पड़ सकता है।

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Uttarakhand Nikay Chunav: General seat in Haldwani Municipal Corporation
उत्तराखंड निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 

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सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक होने के बावजूद अनंतिम अधिसूचना में मेयर की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित कराकर भाजपा खुद ही अपने जाल में फंस गई थी। एक ओर पार्टी में सिर फुटव्वल की नौबत पैदा हो गई तो दूसरी ओर उसे लगने लगा था कि इससे सामान्य वर्ग के मतदाता नाराज हो सकते हैं। यह नाराजगी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारी न पड़े, यह समझाकर भी सीट सामान्य कराई गई।
 

 

हल्द्वानी नगर निगम क्षेत्र के 60 वार्डों की कुल जनसंख्या 2,81,215 में 2,42,010 संख्या मतदाताओं की हैं। अनुसूचित जाति के 26,726 मतदाता हैं, जो कुल जनसंख्या के 9.5 फीसदी हैं। जनजाति के मतदाता 1937 (0.69 फीसदी) हैं। जबकि ओबीसी की मतदाता 51,789 (18.42 फीसदी) हैं। शेष करीब 70 फीसदी से ज्यादा जनसंख्या सामान्य वर्ग के मतदाताओं की है, जो हर चुनाव में निर्णायक साबित होते हैं।

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ऐसे में यदि भाजपा शुरू में ही मेयर की सीट सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित करा लेती तो जनता में यह संदेश जाता कि पार्टी निकाय चुनाव में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व का मौका नहीं दे रही है। दूसरा शुरू में ही सामान्य वर्ग की सीट होने पर पार्टी के लिए दावेदारों का चयन करना कठिन रहता। ऐसे में पार्टी के बड़े पदाधिकारी अपने चहेते को टिकट दिलाने से भी चूक जाते।

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यह सब देखकर पार्टी ने एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया। पहले सीट को अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित कर यह संदेश दिया कि वह सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देना चाहती है। सीट आरक्षित करने के बाद पार्टी में हुए बवंडर से भी भाजपा ने यह जता दिया कि एक वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के बाद प्रत्याशी चयन करना पार्टी के लिए टेड़ी खीर हो गया है। लिहाजा भाजपा ने आखिर में वही किया जो वह शुरू में चाहती थी और मेयर सीट का आरक्षण बदलकर सामान्य कर दिया गया। इसके लिए पार्टी के सामान्य जाति के बड़े नेता भी सक्रिय थे।

 

 

राजनीति के जानकारों का मानना है कि सीट को सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित कर पार्टी ने अपने विरोधी धड़े को तो बाहर का रास्ता दिखा दिया। वहीं अब सामान्य वर्ग के मतदाताओं को साथ लेकर पार्टी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को साधने की भी रणनीति बनाने लगी है।
 

तर्कों के साथ की गई थी आरक्षण को बदलने की मांग
हल्द्वानी शहर के पांडे नबाड़ रहने वाले शेखर जोशी का कहना है कि उन्होंने हल्द्वानी मेयर की सीट को आरक्षित किए जाने के विरोध में शहरी विकास विभाग के निदेशक को पत्र भेजा था। पत्र में तर्क दिया गया था कि हल्द्वानी सीट को अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां से अधिक अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता तो काशीपुर व रुद्रपुर में हैं। हल्द्वानी में अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या मात्र 18.42 फीसदी है जबकि काशीपुर में 38.62 और रुद्रपुर 36.20 फीसदी इस वर्ग के मतदाता हैं। फिर भी दोनों जगह अनंतिम अधिसूचना में सीट अनारक्षित रखी गई और हल्द्वानी मेयर सीट ओबीसी के लिए आरक्षित कर दी गई। इस आधार पर उन्होंने हल्द्वानी मेयर की सीट को अनारक्षित कराने की मांग की थी। 


 

ओबीसी नेताओं के सामने से खिसक गई रसगुल्लों से भरी थाली
अनंतिम अधिसूचना में हल्द्वानी मेयर सीट ओबीसी के लिए आरक्षित होने के बाद इस वर्ग के दावेदार-नेता काफी खुश थे। उन्हें लग रहा था कि अब काफी समय बाद शहर का प्रथम नागरिक ओबीसी से होगा। सात दिन बाद ही उनके आगे से आरक्षण के रसगुल्लों से भरी थाली खिसक गई। सीट सामान्य हो गई। वहीं अब आरक्षण को चुनौती देकर कुछ बदलाव कराने का रास्ता भी नहीं दिख रहा है। 
 

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