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त्रिपुरा सुंदरी मेल में भक्तों ने किए मांग के दर्शन
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नेपाल के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर पूजा करने के लिए आए लोग। संवाद
- फोटो : PITHORAGARH
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झूलाघाट (पिथौरागढ़)। नेपाल के बैतड़ी जिले का सुप्रसिद्ध त्रिपुरा सुंदरी मेले में 20 हजार दर्शनार्थियों ने माता की सवारी के दर्शन किए। मेले में इस बार दो भैंस और 25 बकरियों की बलि ही हो पाई।
कोविड के कारण कोई दुकान भी नहीं लगी। कोविड निगेटिव जांच रिपोर्ट की अनिवार्यता के कारण मां भगवती की पूजा के लिए भारत से भी कम ही लोग पहुंचे।
भारत एवं नेपाल के हिंदुओं की आस्था के लिए प्रख्यात त्रिपुरा सुंदरी मेले की आषाढ़ी जात सोमवार सुबह 11 बजे से शुरू हुई। सुबह माता की सवारी के साथ सैकड़ों भक्त कापड़ीगांव गए। वहां से मंदिर आने के बाद माता का सिंहासन सजधज कर मंदिर परिसर के ग्वालेक धाम (माच) गया।
वहां से मंदिर में आने के भैंसों और बकरियों की बलि दी गई। बाद में अगली पूजा तक माता के सिंहासन को पास के भंडार घर में रख दिया गया।
मेले में कोविड नियंत्रण के लिए बैतड़ी डीएम राजेंद्र पांडेय, एसपी रमेश पाल, सशस्त्र प्रहरी बल के डीएसपी गणेश साह मौजूद रहे। मेले में मंदिर व्यवस्थापन समिति, दशरथ चंद नगर पालिका, नेपाल रेडक्रॉस बैतड़ी शाखा और जन स्वास्थ्य कार्यालय ने 20 हजार मास्क भी बांटे।
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मंदिर समिति के मुखिया पदम चंद ने बताया कि बारिश और कोविड के कारण मेले में भक्तों की संख्या बहुत कम रही। विश्व की विशेष धरोहरों में शामिल इस मंदिर में पूजा करने सुदूर पश्चिम प्रदेश की पूर्व मंत्री प्रदेश सांसद माया भट्ट भी पहुंची। भंडार घर रियासी के अध्यक्ष हिम्मत चंद ने बताया कि आषाढ़ी जात में दर्शनार्थियों की संख्या कार्तिक जात से कम रहती है।
साल में साठ दिन खुलते हैं मंदिर के द्वार
झूलाघाट (पिथौरागढ़)। त्रिपुरा सुंदरी मुख्य पूजा स्थल के द्वार साल में 60 दिन ही खुलते हैं। रियासी भंडारघर के अध्यक्ष विक्रम चंद ने बताया मंदिर में सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की मनौती अवश्य पूरी होती है।
मंदिर प्रत्येक महीने की संक्रांति, औषी, पूर्णिमा, सिरपंचमी, भाई दूज चैत्र नवरात्र में नौ दिन और असोज की नवरात्रि में दशहरे तक 10 दिन खुलता है। मंदिर में पूजा करने वाले लोगों के लिए तीन दिन तक खुद को शुद्ध रखना होता है।
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कोविड के कारण कोई दुकान भी नहीं लगी। कोविड निगेटिव जांच रिपोर्ट की अनिवार्यता के कारण मां भगवती की पूजा के लिए भारत से भी कम ही लोग पहुंचे।
भारत एवं नेपाल के हिंदुओं की आस्था के लिए प्रख्यात त्रिपुरा सुंदरी मेले की आषाढ़ी जात सोमवार सुबह 11 बजे से शुरू हुई। सुबह माता की सवारी के साथ सैकड़ों भक्त कापड़ीगांव गए। वहां से मंदिर आने के बाद माता का सिंहासन सजधज कर मंदिर परिसर के ग्वालेक धाम (माच) गया।
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वहां से मंदिर में आने के भैंसों और बकरियों की बलि दी गई। बाद में अगली पूजा तक माता के सिंहासन को पास के भंडार घर में रख दिया गया।
मेले में कोविड नियंत्रण के लिए बैतड़ी डीएम राजेंद्र पांडेय, एसपी रमेश पाल, सशस्त्र प्रहरी बल के डीएसपी गणेश साह मौजूद रहे। मेले में मंदिर व्यवस्थापन समिति, दशरथ चंद नगर पालिका, नेपाल रेडक्रॉस बैतड़ी शाखा और जन स्वास्थ्य कार्यालय ने 20 हजार मास्क भी बांटे।
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मंदिर समिति के मुखिया पदम चंद ने बताया कि बारिश और कोविड के कारण मेले में भक्तों की संख्या बहुत कम रही। विश्व की विशेष धरोहरों में शामिल इस मंदिर में पूजा करने सुदूर पश्चिम प्रदेश की पूर्व मंत्री प्रदेश सांसद माया भट्ट भी पहुंची। भंडार घर रियासी के अध्यक्ष हिम्मत चंद ने बताया कि आषाढ़ी जात में दर्शनार्थियों की संख्या कार्तिक जात से कम रहती है।
साल में साठ दिन खुलते हैं मंदिर के द्वार
झूलाघाट (पिथौरागढ़)। त्रिपुरा सुंदरी मुख्य पूजा स्थल के द्वार साल में 60 दिन ही खुलते हैं। रियासी भंडारघर के अध्यक्ष विक्रम चंद ने बताया मंदिर में सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की मनौती अवश्य पूरी होती है।
मंदिर प्रत्येक महीने की संक्रांति, औषी, पूर्णिमा, सिरपंचमी, भाई दूज चैत्र नवरात्र में नौ दिन और असोज की नवरात्रि में दशहरे तक 10 दिन खुलता है। मंदिर में पूजा करने वाले लोगों के लिए तीन दिन तक खुद को शुद्ध रखना होता है।