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विकास कार्यों के बूते ही विकास पुरुष बने थे तिवारी
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नैनीताल। कौन जानता था कि नैनीताल जिले के छोटे से गांव बल्यूटी में जन्मा नरैण बड़ा होकर नारायण दत्त तिवारी के रूप में केंद्र से लेकर दो-दो प्रदेशों तक की राजनीति में धमाल मचाएगा और अपने कार्यों की बदौलत ऐसी शोहरत पाएगा कि लोग ताउम्र उसे विकास पुरुष के रूप में याद करेंगे।
एनडी तिवारी का जन्म वर्ष 18 अक्तूबर 1925 को बल्यूटी गांव में हुआ लेकिन उनका पैतृक घर धारी ब्लॉक के पदमपुरी में था। पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अधिकारी थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान पूर्णानंद तिवारी नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। एनडी तिवारी की प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल के सीआरएसटी इंटर कॉलेज के अलावा हल्द्वानी और बरेली में हुई। वर्ष 1942 में जब वह सिर्फ 17 साल के थे, ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ पोस्टर लगाने के आरोप में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर नैनीताल जेल भेज दिया। पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से ही इस जेल में बंद थे। 15 महीने की सजा के बाद वह वर्ष 1944 में रिहा हुए। बाद में तिवारी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए और फिर एलएलबी की डिग्री हासिल की। वर्ष 1947 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गए। यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वर्ष 1954 में तिवारी का विवाह सुशीला सनवाल से हुआ। 93 साल की उम्र में 18 अक्तूबर 2018 को दिल्ली के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
नोएडा को बसाने का श्रेय
नैनीताल। एनडी तिवारी ने सुदूर पहाड़ से लेकर मैदान तक अनगिनत विकास कार्यों को धरातल पर उतारा था। नोएडा को बसाने का श्रेय भी तिवारी को ही जाता है।
1951 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार बने थे विधायक
नैनीताल। वर्ष 1951-52 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव जीता। वर्ष 1963 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। वर्ष 1965 में उन्होंने कांग्रेस की टिकट से काशीपुर से चुनाव लड़ा और जीते भी। इसी साल उन्हें पहली बार मंत्रिमंडल में स्थान मिला। वर्ष 1969 से 1971 तक वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।
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दो राज्यों के सीएम बनने का गौरव
नैनीताल। पहली जनवरी 1976 को वह पहली बार उत्तर प्रदेश के
मुख्यमंत्री बने लेकिन अगले ही साल वर्ष 1977 के जेपी आंदोलन के चलते उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद तिवारी वर्ष 1984 और वर्ष 1988 में भी यूपी के सीएम रहे। वर्ष 1986-87 में तिवारी तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में केंद्र में विदेश मंत्री रहे। उन्होंने केंद्र में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में वर्ष 2002 से 2007 तक राज्य की सत्त संभाली। तिवारी देश के इकलौते ऐसे नेता थे जो दो-दो प्रदेशों के सीएम रहे। 19 अगस्त 2007 को तिवारी को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। पितृत्व विवाद के कारण जीवन के अंतिम पड़ाव में वह थोड़ा असहज हुए थे। 2017 में बेटे रोहित शेखर तिवारी के सियासी ठौर के लिए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकात भी चर्चाओं में रही।
तिवारी कांग्रेस बनाई और चुनाव जीते
नैनीताल। वर्ष 1994 में एनडी तिवारी कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी और पीवी नरसिम्हा राव की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे थे। तब कांग्रेस में खुद की उपेक्षा से नाराज तिवारी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (तिवारी) नाम से पार्टी बना ली। उनकी इस मुहिम में उनके साथ अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार, नटवर सिंह, सतपाल महाराज और रंगराजन कुमार मंगलम जैसे कद्दावर नेता भी शामिल हुए। वर्ष 1996 में तिवारी ने अपनी इसी पार्टी से चुनाव लड़ा। तिवारी ने अपने दम पर तिवारी कांग्रेस से ही नैनीताल सीट से चुनाव जीत लिया।
खुट खुटानी-सूट बिनैक का दिया था नारा
नैनीताल। भीमताल के पास खुटानी से लोहाघाट की ओर जाने वाली सड़क का निर्माण एनडी तिवारी और उनके साथियों ने श्रमदान कर किया था। बुजुर्ग बताते हैं कि तब तिवारी ने नारा दिया खुट खुटानी-सूट बिनैका। यानी सड़क बनने के बाद खुटानी से बिनायक तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही नहीं तिवारी की एक खूबी यह भी थी कि वह लोगों के नाम कभी नहीं भूलते थे।
पीएम बनते बनते रह गए थे तिवारी
नैनीताल। वर्ष 1991 में तिवारी ने कांग्रेस के टिकट पर नैनीताल ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट से सांसद का चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने तिवारी के खिलाफ बलराज पासी को मैदान में उतारा। राम लहर के चलते बलराज पासी ने चुनाव जीत लिया। यह वह दौर था जब कांग्रेस के पास पीएम का चेहरा नहीं था। कांग्रेस हाईकमान ने तब पीवी नरसिम्हा राव को पीएम बनाया। चर्चा थी कि यदि तिवारी इस चुनाव को जीत जाते तो उनका प्रधानमंत्री बनना तय था।
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एनडी तिवारी का जन्म वर्ष 18 अक्तूबर 1925 को बल्यूटी गांव में हुआ लेकिन उनका पैतृक घर धारी ब्लॉक के पदमपुरी में था। पिता पूर्णानंद तिवारी वन विभाग में अधिकारी थे। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान पूर्णानंद तिवारी नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। एनडी तिवारी की प्रारंभिक शिक्षा नैनीताल के सीआरएसटी इंटर कॉलेज के अलावा हल्द्वानी और बरेली में हुई। वर्ष 1942 में जब वह सिर्फ 17 साल के थे, ब्रिटिश सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ पोस्टर लगाने के आरोप में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर नैनीताल जेल भेज दिया। पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से ही इस जेल में बंद थे। 15 महीने की सजा के बाद वह वर्ष 1944 में रिहा हुए। बाद में तिवारी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए और फिर एलएलबी की डिग्री हासिल की। वर्ष 1947 में वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन के अध्यक्ष चुने गए। यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वर्ष 1954 में तिवारी का विवाह सुशीला सनवाल से हुआ। 93 साल की उम्र में 18 अक्तूबर 2018 को दिल्ली के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
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नोएडा को बसाने का श्रेय
नैनीताल। एनडी तिवारी ने सुदूर पहाड़ से लेकर मैदान तक अनगिनत विकास कार्यों को धरातल पर उतारा था। नोएडा को बसाने का श्रेय भी तिवारी को ही जाता है।
1951 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार बने थे विधायक
नैनीताल। वर्ष 1951-52 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) सीट से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव जीता। वर्ष 1963 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। वर्ष 1965 में उन्होंने कांग्रेस की टिकट से काशीपुर से चुनाव लड़ा और जीते भी। इसी साल उन्हें पहली बार मंत्रिमंडल में स्थान मिला। वर्ष 1969 से 1971 तक वह युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।
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दो राज्यों के सीएम बनने का गौरव
नैनीताल। पहली जनवरी 1976 को वह पहली बार उत्तर प्रदेश के
मुख्यमंत्री बने लेकिन अगले ही साल वर्ष 1977 के जेपी आंदोलन के चलते उनकी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद तिवारी वर्ष 1984 और वर्ष 1988 में भी यूपी के सीएम रहे। वर्ष 1986-87 में तिवारी तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में केंद्र में विदेश मंत्री रहे। उन्होंने केंद्र में कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद उन्होंने तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में वर्ष 2002 से 2007 तक राज्य की सत्त संभाली। तिवारी देश के इकलौते ऐसे नेता थे जो दो-दो प्रदेशों के सीएम रहे। 19 अगस्त 2007 को तिवारी को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। पितृत्व विवाद के कारण जीवन के अंतिम पड़ाव में वह थोड़ा असहज हुए थे। 2017 में बेटे रोहित शेखर तिवारी के सियासी ठौर के लिए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकात भी चर्चाओं में रही।
तिवारी कांग्रेस बनाई और चुनाव जीते
नैनीताल। वर्ष 1994 में एनडी तिवारी कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी और पीवी नरसिम्हा राव की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट चल रहे थे। तब कांग्रेस में खुद की उपेक्षा से नाराज तिवारी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (तिवारी) नाम से पार्टी बना ली। उनकी इस मुहिम में उनके साथ अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार, नटवर सिंह, सतपाल महाराज और रंगराजन कुमार मंगलम जैसे कद्दावर नेता भी शामिल हुए। वर्ष 1996 में तिवारी ने अपनी इसी पार्टी से चुनाव लड़ा। तिवारी ने अपने दम पर तिवारी कांग्रेस से ही नैनीताल सीट से चुनाव जीत लिया।
खुट खुटानी-सूट बिनैक का दिया था नारा
नैनीताल। भीमताल के पास खुटानी से लोहाघाट की ओर जाने वाली सड़क का निर्माण एनडी तिवारी और उनके साथियों ने श्रमदान कर किया था। बुजुर्ग बताते हैं कि तब तिवारी ने नारा दिया खुट खुटानी-सूट बिनैका। यानी सड़क बनने के बाद खुटानी से बिनायक तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही नहीं तिवारी की एक खूबी यह भी थी कि वह लोगों के नाम कभी नहीं भूलते थे।
पीएम बनते बनते रह गए थे तिवारी
नैनीताल। वर्ष 1991 में तिवारी ने कांग्रेस के टिकट पर नैनीताल ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट से सांसद का चुनाव लड़ा जबकि भाजपा ने तिवारी के खिलाफ बलराज पासी को मैदान में उतारा। राम लहर के चलते बलराज पासी ने चुनाव जीत लिया। यह वह दौर था जब कांग्रेस के पास पीएम का चेहरा नहीं था। कांग्रेस हाईकमान ने तब पीवी नरसिम्हा राव को पीएम बनाया। चर्चा थी कि यदि तिवारी इस चुनाव को जीत जाते तो उनका प्रधानमंत्री बनना तय था।