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...तो सीमांत पिथौरागढ़ कमिश्ररी क्यों नहीं?
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चंपावत। विधानसभा चुनाव से दस माह पहले बृहस्पतिवार को भाजपा सरकार के आखिरी बजट में सबसे चौंकाने वाला निर्णय प्रदेश में तीसरी कमिश्नरी का अस्तित्व में आना रहा। गैरसैंण पिछले साल राज्य की दूसरी राजधानी बना, तो इस बार बजट सत्र के दौरान बृहस्पतिवार को उसे राज्य की तीसरी कमिश्नरी के रूप में जगह दे दी गई। एकाएक हुए इस ऐलान से कहीं खुशी है, तो कहीं मायूसी भी। खासकर कुमाऊं के सुदूर सीमांत जिले पिथौरागढ़ को कमिश्नरी बनाने की लंबे समय से उठ रही आवाज को झटका लगा है। सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होने के अलावा मजबूत बुनियादी ढांचे की वजह से कमिश्नरी का पिथौरागढ़ का दावा वैसे भी दमदार था। अलबत्ता उसकी इस अनदेखी से कई जानकार हैरान है।
उत्तराखंड की नेपाल सीमा से लगे तीनों जिले (पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर) कुमाऊं में हैं। 15 लाख से अधिक आबादी वाले इन तीनों जिलों की कुल 275 किमी की सीमा नेपाल से लगती है। सामरिक लिहाज से संवेदनशील पिथौरागढ़ जिले का प्रदेश की राजधानी से फासला (481 किमी) भी ज्यादा है। चंपावत विकास एवं संघर्ष समिति के नेता बसंत तड़ागी का मानना है कि ऐसे में अगर पिथौरागढ़ को कमिश्नरी का दर्जा दिया जाना ज्यादा औचित्यपूर्ण होता। इस कमिश्नरी में सीमांत के तीनों जिलों को शामिल किया जा सकता था।
कमिश्नरी की जरूरत के अलावा पिथौरागढ़ का बुनियादी ढांचा भी सशक्त है। बारहमासी सड़क के अलावा हवाई पट्टी भी यहां है। कैलास मानसरोवर मार्ग की हर साल होने वाली आध्यात्मिक यात्रा के अलावा गुंजी-तकलाकोट मार्ग पर भारत-चीन के बीच होने वाला व्यापार भी महत्वपूर्ण है। यहां तक कि पिथौरागढ़ में 2013 तक पुलिस उप महानिरीक्षक कार्यालय भी था। चंपावत-पिथौरागढ़ जिले में ही आईटीबीपी की तीन और एसएसबी की दो बटालियन भी है।
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सीमांत जिला पिथौरागढ़ सामरिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से संजीदा है। तमाम वजहों से पिथौरागढ़ को कमिश्नरी बनाने की लंबे समय से आवाज उठती रही, लेकिन कमिश्नरी के रूप में इसकी अनदेखी की गई। सरकार को इस पर फिर से विचार करना चाहिए।
नवीन मुरारी,
राज्य आंदोलनकारी, लोहाघाट।
गैरसैंण के साथ ही पिथौरागढ़ को भी कमिश्नरी बनाया होता, तो इससे इस सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की उम्मीद भी पूरी होती। ऐसा करने से सैन्य बाहुल्य इस सीमांत क्षेत्र की आर्थिक तरक्की को और ज्यादा रफ्तार मिलती।
रिटायर्ड कैप्टन पीएस देव,
चार जिलों की मांग की भी हो गई अनदेखी
चंपावत। अगस्त 2011 को डीडीहाट का नए जिले के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने ऐलान किया था, लेकिन यह जिला आज तक नहीं बना। इसी तरह रानीखेत, काशीपुर और खटीमा से भी अलग जिले की लंबे समय से आवाज उठ रही है, लेकिन इन्हें आज तक जिला नहीं बनाया गया। अब सरकार नए जिलों के गठन के लिए पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट की दलील दे रही है। कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री हेमेश खर्कवाल का कहना है कि छोटे राज्य में छोटी प्रशासनिक इकाइयों के गठन से लोगों को अधिक सहुलियत दी जा सकती है।
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उत्तराखंड की नेपाल सीमा से लगे तीनों जिले (पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर) कुमाऊं में हैं। 15 लाख से अधिक आबादी वाले इन तीनों जिलों की कुल 275 किमी की सीमा नेपाल से लगती है। सामरिक लिहाज से संवेदनशील पिथौरागढ़ जिले का प्रदेश की राजधानी से फासला (481 किमी) भी ज्यादा है। चंपावत विकास एवं संघर्ष समिति के नेता बसंत तड़ागी का मानना है कि ऐसे में अगर पिथौरागढ़ को कमिश्नरी का दर्जा दिया जाना ज्यादा औचित्यपूर्ण होता। इस कमिश्नरी में सीमांत के तीनों जिलों को शामिल किया जा सकता था।
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कमिश्नरी की जरूरत के अलावा पिथौरागढ़ का बुनियादी ढांचा भी सशक्त है। बारहमासी सड़क के अलावा हवाई पट्टी भी यहां है। कैलास मानसरोवर मार्ग की हर साल होने वाली आध्यात्मिक यात्रा के अलावा गुंजी-तकलाकोट मार्ग पर भारत-चीन के बीच होने वाला व्यापार भी महत्वपूर्ण है। यहां तक कि पिथौरागढ़ में 2013 तक पुलिस उप महानिरीक्षक कार्यालय भी था। चंपावत-पिथौरागढ़ जिले में ही आईटीबीपी की तीन और एसएसबी की दो बटालियन भी है।
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सीमांत जिला पिथौरागढ़ सामरिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से संजीदा है। तमाम वजहों से पिथौरागढ़ को कमिश्नरी बनाने की लंबे समय से आवाज उठती रही, लेकिन कमिश्नरी के रूप में इसकी अनदेखी की गई। सरकार को इस पर फिर से विचार करना चाहिए।
नवीन मुरारी,
राज्य आंदोलनकारी, लोहाघाट।
गैरसैंण के साथ ही पिथौरागढ़ को भी कमिश्नरी बनाया होता, तो इससे इस सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की उम्मीद भी पूरी होती। ऐसा करने से सैन्य बाहुल्य इस सीमांत क्षेत्र की आर्थिक तरक्की को और ज्यादा रफ्तार मिलती।
रिटायर्ड कैप्टन पीएस देव,
चार जिलों की मांग की भी हो गई अनदेखी
चंपावत। अगस्त 2011 को डीडीहाट का नए जिले के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने ऐलान किया था, लेकिन यह जिला आज तक नहीं बना। इसी तरह रानीखेत, काशीपुर और खटीमा से भी अलग जिले की लंबे समय से आवाज उठ रही है, लेकिन इन्हें आज तक जिला नहीं बनाया गया। अब सरकार नए जिलों के गठन के लिए पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट की दलील दे रही है। कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री हेमेश खर्कवाल का कहना है कि छोटे राज्य में छोटी प्रशासनिक इकाइयों के गठन से लोगों को अधिक सहुलियत दी जा सकती है।