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कुमाऊं की शताब्दी बनी पहली ट्रेन, जिसे चलाती बेटियां
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Mon, 20 Feb 2017 12:14 AM IST
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सुनीता
- फोटो : amar ujala
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1882 में कुमाऊं के लिए पहली ट्रेन चली थी, इस दौरान रेलवे ने कई बदलाव देखे हैं। सवा सौ साल बाद कुमाऊं के रेलवे के इतिहास में एक नई इबरात लिखी गई है। रेलवे ने कुमाऊं से चलने वाली सबसे वीआईपी शताब्दी ट्रेन की कमान बेटियों को सौंपी है। कुमाऊं की यह पहली ट्रेन है, जिसे बेटियां कुशलतापूर्वक चला रही हैं। रेल के अधिकारी भी इस उपलब्धि से गदगद है।
बेटियां हर उस क्षेत्र में दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही है, जो सामान्य तौर पर पुरुष प्रधान काम माने जाते थे।
रेलवे ने भी बेटियों की हिम्मत, कौशल और दक्षता को सलाम किया है। काठगोदाम से नई दिल्ली के बीच चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस की कमान बेटियों को सौंपी गई है। पांच बेटियां सुनीता कुमारी, अंजू सिंह, रेनू श्रीवास, आकांक्षा और रीना को शताब्दी एक्सप्रेस में सहायक लोको पायलट के तौर पर तैनाती दी गई है। इसमें से एक लोको पायलट सुनीता कुमारी कहती हैं कि ट्रेन को चलाने में गौरव का अहसास होता है। एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसमें अपने सहयोगियों के माध्यम से पूरा किया जाता है। कई चुनौतियां भी आती हैं। शुरुआत में डर लगा था, अब सामंजस्य बैठा लिया है।
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काठगोदाम लोको पायलट जगमोहन कहते हैं कि बेटियां कुशलतापूर्वक ट्रेनों का संचालन कर रही हैं, जहां कोई दिक्कत आती है, सभी मदद के लिए तैयार रहते हैं। काठगोदाम स्टेशन प्रबंधक चयन राय कहते हैं कि अन्य जगहों पर बेटियां ट्रेन को चला रही हैं, लेकिन कुमाऊं की यह पहली ट्रेन है, जिसकी कमान बेटियों को सौंपी गई है। रेलवे ने सबसे वीआईपी ट्रेेन का संचालन बेटियों को दिया है। यह गौरव की बात है।
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