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Nainital News: लाल और काले राजमा में छिपा सेहत का गहरा राज
Wed, 12 Aug 2026 12:16 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Wed, 12 Aug 2026 12:16 AM IST
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नैनीताल। उत्तराखंड की देशी राजमा की किस्मों पर किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि गहरे रंग, खासकर लाल और काले दानों वाले राजमा में एंटीऑक्सीडेंट और जैव-सक्रिय तत्वों की मात्रा अधिक होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह निष्कर्ष भविष्य में अधिक पोषणयुक्त, रोगरोधी और बदलती जलवायु के अनुकूल राजमा की नई किस्में विकसित करने की दिशा में अहम आधार बन सकता है।
राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी अधिकारी डॉ. राहुल देव ने पूजा ओली और शैलजा पुनेठा के साथ यह अध्ययन किया। शोध में उत्तराखंड के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों से एकत्र की गई 73 देशी राजमा किस्मों को शामिल किया गया। वैज्ञानिकों ने इन किस्मों के पौधों के आकार, फलियों और बीजों की आकृति जैसे कृषि एवं आकृतिक गुणों का अध्ययन करने के साथ ही कटाई के बाद दानों में मौजूद पोषक और जैव-रासायनिक तत्वों का भी विश्लेषण किया।
लाल-काले दानों में एंटीऑक्सीडेंट की भरमार
अध्ययन के दौरान राजमा के अलग-अलग रंगों वाले दानों के गुणों की तुलना की गई। इसमें पाया गया कि लाल और काले राजमा में फिनोलिक यौगिक, फ्लेवोनॉइड्स, एंथोसाइनिन और कुल एंटीऑक्सीडेंट क्षमता अन्य रंगों की तुलना में अधिक थी। ये जैव-सक्रिय यौगिक शरीर में मुक्त कणों यानी फ्री रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाव में भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि राजमा के दाने का रंग उसके सभी पोषक गुणों का पैमाना नहीं है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा का दानों के रंग से सीधा संबंध नहीं पाया गया। इन गुणों को राजमा की आनुवंशिक संरचना यानी जीनोटाइप और खेती की ऊंचाई समेत कई पर्यावरणीय कारक प्रभावित करते हैं।
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पोषण का खजाना है राजमा
राजमा भारतीय भोजन में पौध-आधारित प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। खासकर शाकाहारी आहार में इसका विशेष स्थान है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आहार फाइबर, आयरन, जिंक, कैल्शियम और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, राजमा में चावल की तुलना में 4 से 10 गुना अधिक आयरन और 2 से 3 गुना अधिक जिंक पाया जा सकता है। वहीं, इसमें केले की तुलना में करीब तीन गुना अधिक पोटैशियम होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में राजमा न सिर्फ पहाड़ की पारंपरिक फसल है, बल्कि पोषण सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण फसल है।
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यहां के राजमा की बहुत पूछ
प्रदेश में देवाल (चकराता), अल्मोड़ा और मुनस्यारी में लाल राजमा की खेती होती है। रामगढ़ और मुक्तेश्वर का काला राजमा काफी प्रसिद्ध है। पिथौरागढ़ के धारचूला में लाल और काले दोनों प्रकार के राजमा की खेती होती है। इनकी काफी मांग रहती है।
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इन देशी किस्मों की वैज्ञानिक पहचान और संरक्षण से न केवल बेहतर गुणवत्ता वाली नई किस्में विकसित की जा सकेंगी बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने, किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। - डॉ. राहुल देव, वरिष्ठ वैज्ञानिक (एनबीपीजीआर )
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राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी अधिकारी डॉ. राहुल देव ने पूजा ओली और शैलजा पुनेठा के साथ यह अध्ययन किया। शोध में उत्तराखंड के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों से एकत्र की गई 73 देशी राजमा किस्मों को शामिल किया गया। वैज्ञानिकों ने इन किस्मों के पौधों के आकार, फलियों और बीजों की आकृति जैसे कृषि एवं आकृतिक गुणों का अध्ययन करने के साथ ही कटाई के बाद दानों में मौजूद पोषक और जैव-रासायनिक तत्वों का भी विश्लेषण किया।
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लाल-काले दानों में एंटीऑक्सीडेंट की भरमार
अध्ययन के दौरान राजमा के अलग-अलग रंगों वाले दानों के गुणों की तुलना की गई। इसमें पाया गया कि लाल और काले राजमा में फिनोलिक यौगिक, फ्लेवोनॉइड्स, एंथोसाइनिन और कुल एंटीऑक्सीडेंट क्षमता अन्य रंगों की तुलना में अधिक थी। ये जैव-सक्रिय यौगिक शरीर में मुक्त कणों यानी फ्री रेडिकल्स से होने वाले ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाव में भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि राजमा के दाने का रंग उसके सभी पोषक गुणों का पैमाना नहीं है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा का दानों के रंग से सीधा संबंध नहीं पाया गया। इन गुणों को राजमा की आनुवंशिक संरचना यानी जीनोटाइप और खेती की ऊंचाई समेत कई पर्यावरणीय कारक प्रभावित करते हैं।
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पोषण का खजाना है राजमा
राजमा भारतीय भोजन में पौध-आधारित प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। खासकर शाकाहारी आहार में इसका विशेष स्थान है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आहार फाइबर, आयरन, जिंक, कैल्शियम और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, राजमा में चावल की तुलना में 4 से 10 गुना अधिक आयरन और 2 से 3 गुना अधिक जिंक पाया जा सकता है। वहीं, इसमें केले की तुलना में करीब तीन गुना अधिक पोटैशियम होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में राजमा न सिर्फ पहाड़ की पारंपरिक फसल है, बल्कि पोषण सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण फसल है।
यहां के राजमा की बहुत पूछ
प्रदेश में देवाल (चकराता), अल्मोड़ा और मुनस्यारी में लाल राजमा की खेती होती है। रामगढ़ और मुक्तेश्वर का काला राजमा काफी प्रसिद्ध है। पिथौरागढ़ के धारचूला में लाल और काले दोनों प्रकार के राजमा की खेती होती है। इनकी काफी मांग रहती है।
इन देशी किस्मों की वैज्ञानिक पहचान और संरक्षण से न केवल बेहतर गुणवत्ता वाली नई किस्में विकसित की जा सकेंगी बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने, किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। - डॉ. राहुल देव, वरिष्ठ वैज्ञानिक (एनबीपीजीआर )