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Nainital News: मुख्य न्यायाधीश ने साक्ष्यों की कड़ी में अंतर पर जताई चिंता
Sun, 27 Sep 2026 12:44 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Sun, 27 Sep 2026 12:44 AM IST
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भवाली (नैनीताल)। उत्तराखंड न्यायिक एवं विधिक अकादमी (उजाला) में चिकित्सीय न्यायशास्त्र, बैलिस्टिक साक्ष्य, साइबर अपराध तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता एवं मूल्यांकन को लेकर शनिवार को महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि अल्मोड़ा के तिहरे हत्याकांड से लेकर पिथौरागढ़ से देहरादून तक के कई मामलों में साक्ष्यों की सुरक्षित कड़ी में आने वाला छोटा सा अंतर, प्राथमिकी और सामान्य डायरी में दर्ज विवरण, मौके पर पंचनामा तैयार करने और साक्ष्य को सील न करने जैसी कमियां पूरे मुकदमे के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि मौके पर ही साक्ष्य को सील करने, उसकी लिखापढ़ी करने और इसके बाद मालखाने में जमा करने की व्यवस्था में किसी तरह का अंतर नहीं होना चाहिए।
हाईकोर्ट के न्यायाधीश रविंद्र मैथाणी ने कहा कि विवेचना केवल पुलिस का कार्य नहीं है। वर्तमान में चिकित्सीय, बैलिस्टिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि एकत्र किया गया साक्ष्य न्यायालय में स्वीकार्य हो।
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अकादमी के निदेशक प्रदीप पंत ने कहा कि अपराधों की बदलती प्रकृति के चलते विभिन्न विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। अपर निदेशक शादाब बानो ने साक्ष्यों की सुरक्षित कड़ी के तहत बाल, खून या किसी भी वस्तु को मौके पर ही सील करने, मालखाना रजिस्टर और सामान्य डायरी में प्रविष्टि करने तथा नियमानुसार विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजने पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को गिरफ्तारी का आधार बताना आवश्यक है। नार्को और बहुप्रारूप परीक्षण जबरदस्ती नहीं कराए जा सकते। कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक और भयमुक्त तरीके से विवेचना करने तथा व्यवस्था में जहां कमी है, वहीं से सुधार की शुरुआत करने का संकल्प लिया।
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कार्यक्रम में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि अल्मोड़ा के तिहरे हत्याकांड से लेकर पिथौरागढ़ से देहरादून तक के कई मामलों में साक्ष्यों की सुरक्षित कड़ी में आने वाला छोटा सा अंतर, प्राथमिकी और सामान्य डायरी में दर्ज विवरण, मौके पर पंचनामा तैयार करने और साक्ष्य को सील न करने जैसी कमियां पूरे मुकदमे के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि मौके पर ही साक्ष्य को सील करने, उसकी लिखापढ़ी करने और इसके बाद मालखाने में जमा करने की व्यवस्था में किसी तरह का अंतर नहीं होना चाहिए।
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हाईकोर्ट के न्यायाधीश रविंद्र मैथाणी ने कहा कि विवेचना केवल पुलिस का कार्य नहीं है। वर्तमान में चिकित्सीय, बैलिस्टिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि एकत्र किया गया साक्ष्य न्यायालय में स्वीकार्य हो।
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अकादमी के निदेशक प्रदीप पंत ने कहा कि अपराधों की बदलती प्रकृति के चलते विभिन्न विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। अपर निदेशक शादाब बानो ने साक्ष्यों की सुरक्षित कड़ी के तहत बाल, खून या किसी भी वस्तु को मौके पर ही सील करने, मालखाना रजिस्टर और सामान्य डायरी में प्रविष्टि करने तथा नियमानुसार विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजने पर जोर दिया।
उन्होंने बताया कि गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को गिरफ्तारी का आधार बताना आवश्यक है। नार्को और बहुप्रारूप परीक्षण जबरदस्ती नहीं कराए जा सकते। कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने वैज्ञानिक और भयमुक्त तरीके से विवेचना करने तथा व्यवस्था में जहां कमी है, वहीं से सुधार की शुरुआत करने का संकल्प लिया।