{"_id":"5f57d0af8ebc3e39d87bf13f","slug":"shaktifarm-quilts-are-sold-in-america-uk-and-dubai-haldwani-news-hld39626484","type":"story","status":"publish","title_hn":"अमेरिका, ब्रिटेन और दुबई तक बिकती हैं शक्तिफार्म की रजाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अमेरिका, ब्रिटेन और दुबई तक बिकती हैं शक्तिफार्म की रजाई
विज्ञापन
शक्तिफार्म के बैकुंठपुर में महिलाओं को रजाई देने आए कंपनी कर्मी।
- फोटो : SITARGANJ
मो. यामीन अंसारी
सितारगंज। लॉकडाउन में भले ही औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार की कमी आई हो। लेकिन ग्रामीण अंचलों में कुटीर उद्योग के रूप में चल रहे रजाई सिलने के कार्य में कोई कमी नहीं आई। महिला कामगार फैक्ट्रियों से हटने के बाद घरों पर ही रजाई सिलने का कार्य कर रही हैं। खासकर बंगाली बाहुल्य क्षेत्र शक्तिफार्म में महिलाओं की ओर से बनाई जा रही फैशनेबल रजाई भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दुबई तक बिक रही हैं।
शक्तिफार्म क्षेत्र के गोविंदनगर, बैकुंठपुर, रूदपुर, सुरेंद्रनगर, निर्मलनगर, राजनगर, अरविंदनगर, गुरुग्राम, टैगोरनगर, देवनगर आदि गांवों की लगभग तीन हजार बंगाली समुदाय की महिलाएं फैशनेबल रजाई सिलने का कार्य करती हैं। ये फैशनेबल रजाई दिल्ली एवं हरियाणा के गुरुग्राम में स्थिति कई कंपनियों की ओर से बनवाई जाती हैं। इन कंपनियों के ठेकेदार रजाई में प्रयुक्त होने वाला कपड़ा, रुई, धागा, सुई आदि सामग्री उपलब्ध कराते हैं।
ठेकेदार के कर्मचारी बाइक पर लादकर इन रजाइयों को सिलने के लिए महिला कामगारों को उनके घर जाकर देते हैं। रजाई के साइज व डिजाइन के अनुसार महिलाओं को सिलाई (जॉब वर्क) के एवज में 20 से लेकर 800 रुपये तक का भुगतान किया जाता है। यह भुगतान मासिक होता है।
विज्ञापन
ठेका कंपनी बीके इंटरप्राइजेज के सुनील हालदार व अजय अग्रवाल बताते हैं कि जॉब वर्क के अनुसार पांच फीसदी जीएसटी भी जमा की जाती है।
रजाई सिलने के बाद इसे गुडग़ांव व दिल्ली स्थित कंपनियों में भेजते हैं। वहां यह रजाइयां कई स्तर पर जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद वाशिंग व डिब्बाबंद पैकिंग होती है। दिल्ली के दादरी रेलवे स्टेशन से कंटेनर में भरकर मुंबई भेजी जाती है। वहां से पानी के जहाज व मालवाहक हवाई जहाज से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन व दुबई आदि देशों को यह रजाई आपूर्ति होती हैं।
वह बताते हैं कि अभी कंपनियों द्वारा इन फैशनेबल रजाइयों को तैयार कर उनका स्टॉक किया जा रहा है। सर्द मौसम में यह भारत के अलावा विदेशों के बाजारों में बिकेंगी।
श्रम, हस्तकरघा की योजनाओं का नहीं मिलता लाभ
सितारगंज। रजाई सिलने वाली महिला कामगारों का कहना है कि सरकार की ओर से महिलाओं को स्वरोजगार से जोडने के लिए समय-समय पर योजनाएं चलाई जाती हैं। लेकिन उन्हें आज तक किसी भी योजना का लाभ नहीं मिला। कहा कि उनका भी हस्तकरघा अथवा श्रम विभाग में पंजीकरण होना चाहिए। ताकि उन्हें भी योजना का लाभ मिल सके। संवाद
श्रम विभाग में भवन निर्माण, टेलीफोन लाइन बिछाने, टावर लगाने, प्लंबर आदि का कार्य करने वाले मिस्त्री व मजदूरों का पंजीकरण किया जाता है। रजाई सिलने वाली कामगार महिलाओं के पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं है। इस वजह से इनका पंजीकरण नहीं हो सका। - मीनाक्षी भट्ट, लेबर इंस्पेक्टर, खटीमा-सितारगंज।
विज्ञापन
सितारगंज। लॉकडाउन में भले ही औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार की कमी आई हो। लेकिन ग्रामीण अंचलों में कुटीर उद्योग के रूप में चल रहे रजाई सिलने के कार्य में कोई कमी नहीं आई। महिला कामगार फैक्ट्रियों से हटने के बाद घरों पर ही रजाई सिलने का कार्य कर रही हैं। खासकर बंगाली बाहुल्य क्षेत्र शक्तिफार्म में महिलाओं की ओर से बनाई जा रही फैशनेबल रजाई भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दुबई तक बिक रही हैं।
शक्तिफार्म क्षेत्र के गोविंदनगर, बैकुंठपुर, रूदपुर, सुरेंद्रनगर, निर्मलनगर, राजनगर, अरविंदनगर, गुरुग्राम, टैगोरनगर, देवनगर आदि गांवों की लगभग तीन हजार बंगाली समुदाय की महिलाएं फैशनेबल रजाई सिलने का कार्य करती हैं। ये फैशनेबल रजाई दिल्ली एवं हरियाणा के गुरुग्राम में स्थिति कई कंपनियों की ओर से बनवाई जाती हैं। इन कंपनियों के ठेकेदार रजाई में प्रयुक्त होने वाला कपड़ा, रुई, धागा, सुई आदि सामग्री उपलब्ध कराते हैं।
विज्ञापन
ठेकेदार के कर्मचारी बाइक पर लादकर इन रजाइयों को सिलने के लिए महिला कामगारों को उनके घर जाकर देते हैं। रजाई के साइज व डिजाइन के अनुसार महिलाओं को सिलाई (जॉब वर्क) के एवज में 20 से लेकर 800 रुपये तक का भुगतान किया जाता है। यह भुगतान मासिक होता है।
विज्ञापन
ठेका कंपनी बीके इंटरप्राइजेज के सुनील हालदार व अजय अग्रवाल बताते हैं कि जॉब वर्क के अनुसार पांच फीसदी जीएसटी भी जमा की जाती है।
रजाई सिलने के बाद इसे गुडग़ांव व दिल्ली स्थित कंपनियों में भेजते हैं। वहां यह रजाइयां कई स्तर पर जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद वाशिंग व डिब्बाबंद पैकिंग होती है। दिल्ली के दादरी रेलवे स्टेशन से कंटेनर में भरकर मुंबई भेजी जाती है। वहां से पानी के जहाज व मालवाहक हवाई जहाज से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन व दुबई आदि देशों को यह रजाई आपूर्ति होती हैं।
वह बताते हैं कि अभी कंपनियों द्वारा इन फैशनेबल रजाइयों को तैयार कर उनका स्टॉक किया जा रहा है। सर्द मौसम में यह भारत के अलावा विदेशों के बाजारों में बिकेंगी।
श्रम, हस्तकरघा की योजनाओं का नहीं मिलता लाभ
सितारगंज। रजाई सिलने वाली महिला कामगारों का कहना है कि सरकार की ओर से महिलाओं को स्वरोजगार से जोडने के लिए समय-समय पर योजनाएं चलाई जाती हैं। लेकिन उन्हें आज तक किसी भी योजना का लाभ नहीं मिला। कहा कि उनका भी हस्तकरघा अथवा श्रम विभाग में पंजीकरण होना चाहिए। ताकि उन्हें भी योजना का लाभ मिल सके। संवाद
श्रम विभाग में भवन निर्माण, टेलीफोन लाइन बिछाने, टावर लगाने, प्लंबर आदि का कार्य करने वाले मिस्त्री व मजदूरों का पंजीकरण किया जाता है। रजाई सिलने वाली कामगार महिलाओं के पंजीकरण का कोई प्रावधान नहीं है। इस वजह से इनका पंजीकरण नहीं हो सका। - मीनाक्षी भट्ट, लेबर इंस्पेक्टर, खटीमा-सितारगंज।

शक्तिफार्म के बैकुंठपुर में फैशनेबल रजाई सिलती महिला कामगार।- फोटो : SITARGANJ