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Saraswati Pandey: सरस्वती के सत्याग्रह ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव, जानिए इनकी कहानी
Tue, 17 Oct 2023 03:18 PM IST
हीरा मेहरा
मयंक जोशी, संवाद
मयंक जोशी, संवाद
Published by: हीरा मेहरा
Updated Tue, 17 Oct 2023 03:18 PM IST
सार
भीमताल की वीरांगना सरस्वती पांडे का नाम गर्व से लिया जाता है। सरस्वती ने गर्भावस्था में भी अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ भवाली थाने में सत्याग्रह छेड़ दिया और अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए।
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भीमताल की वीरांगना सरस्वती पांडे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हिंदुस्तान में अंग्रेजी सल्तनत की नींव हिलाने वालों में भीमताल की वीरांगना सरस्वती पांडे का नाम गर्व से लिया जाता है। सरस्वती ने गर्भावस्था में भी अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ भवाली थाने में सत्याग्रह छेड़ दिया और अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाए। इससे बोखलाकर अंग्रेज सरकार ने 28 अप्रेल 1941 को सरस्वती के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।
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दो मई 1941 को अंग्रेजी अदालत ने उन्हें छह माह कैद की सजा सुनाई। सरस्वती ने गर्भावस्था के दौरान जेल में असहनीय पीड़ा झेली। सरस्वती की हालत बिगड़ने पर प्रसव से पूर्व उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया।
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स्वतंत्रता सेनानी सरस्वती पांडे का जन्म मई 1923 में धारी ब्लॉक के दुुदली गांव में मोती राम शर्मा के घर में हुआ। सरस्वती ने पांच तक की पढ़ाई गांव के ही स्कूल से की। इसके बाद जूनियर हाईस्कूल ओखलकांडा से कक्षा आठ तक पढ़ाई की। 17 वर्ष की उम्र में उनका विवाह भीमताल के ढुंगसिल निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोतीराम पांडे से हुआ। सेनानी मोतीराम पांडे कभी गर्म दल के नेता हुआ करते थे।
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अंग्रेजी सरकार के खिलाफ विद्रोह करने पर उन्हें कई साल रंगून जेल में काटने पड़े। घर लौटने के बाद उनका विवाह सरस्वती से हुआ। विवाह के बाद पति से प्रेरित होकर सरस्वती भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ीं।
महात्मा गांधी के सत्याग्रह के लिए चुने गए लोगों में सरस्वती और मोतीराम दोनों शामिल थे। 13 जनवरी 1941 को रानीबाग में अहिंसात्मक सत्याग्रह का ऐलान किया गया था। इससे एक दिन पूर्व ही 12 जनवरी को सेनानी मोतीराम को गिरफ्तार कर लिया गया। 14 जनवरी को उन्हें एक साल कारावास की सजा सुनाई गई। पति को कारावास होने पर सरस्वती ने गर्भावस्था में भी भवाली में हुए सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। इस पर सरस्वती को गर्भावस्था में छह महीने जेल में सजा काटनी पड़ी। तबियत बिगड़ने पर उन्हें जेल से रिहा कर गांव भेज दिया गया।
गांव में उन्होंने सबसे बड़े बेटे मोहन चंद्र पांडे को जन्म दिया। वहीं उनके पति मोतीराम को गर्म दल की गतिविधियों में शामिल होने के कारण तीन साल तक कलकत्ता की कालकोठरी में कैद कर दिया गया। मोतीराम जब जेल से वापस लौटे तब उनके बड़े बेटा मोहन ढाई वर्ष का हो चुका था। आजादी के पच्चीस साल बाद दोनों स्वतंत्रता सेनानी पति-पत्नि को भारत सरकार ने ताम्र पत्र से सम्मानित किया। भीमताल के जीजीआईसी का नाम सेनानी सरस्वती पांडे के नाम पर पड़ा है।
पूर्व सीएम हरीश रावत ने भीमताल के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का नाम स्वतंत्रता सेनानी मोतीराम पांडे के नाम पर रखने की घोषणा की थी, ये घोषणा आज तक पूरी नहीं हुई। सरस्वती के पुत्र केडी पांडे का कहना है कि आजादी के लड़ाई में माता-पिता ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। परिवार आर्थिक संकट से जूझता रहा। मां ने अध्यापिका का कार्य कर परिवार को संबल प्रदान किया।
सरस्वती ने अध्यापिक बनकर परिवार का पालन पोषण किया
सत्याग्रह में भाग लेने पर अंग्रेज सरकार ने सरस्वती और मोतीराम की जमीन जायदाद की कुर्की कर दी। इस कारण परिवार को आजीवन आर्थिक संकट से जूझना पड़ा। सरस्वती और मोतीराम के पांच पुत्र और दो पुत्रियां हुईं। परिवार के पालन पोषण के लिए सरस्वती ने गांव के ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। 1952 में अल्मोड़ा में अध्यापिका की ट्रेनिंग भी ली। इसके बाद उन्होंने घर-घर जाकर लड़कियों को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। शिक्षा के साथ लड़कियों को सिलाई, कड़ाई, बुनाई आदि का भी प्रशिक्षण दिया। सरस्वती के छात्र उम्र के आखिरी पड़ाव में हैं और उनके योगदान को आज भी याद करते हैं।
सरकारी सुविधाएं लेने से किया इंकार
पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने स्वतंत्रता सेनानी दंपत्ति को राजनीति में शामिल होने का प्रस्ताव दिया लेकिन सेनानी दंपत्ति ने ना तो कोई चुनाव लड़ा और ना ही कोई पद लिया। यहां तक कि स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली मदद से भी सरस्वती और मोतीराम ने इंकार कर दिया। दोनों ने साफ कहा कि आजादी की लड़ाई किसी इनाम के लालच के लिए नहीं लड़ी थी।
मोहन को विरासत में मिला देश-प्रेम का जज्बा
सरस्वती के बड़े बेटे मोहन ने मां के गर्भ में छह महीने जेल में बिताए। जेल से रिहा होने के बाद गांव में मोहन का जन्म हुआ। मोहन को देशप्रेम का जज्बा विरासत में मिला। 1965 में हुए भारत-पाक युद्ध में कैप्टन मोहन चंद्र को गोली लगने पर पांव काटना पड़ा। इसके बाद उन्होंने सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाई। इसी साल जनवरी में वह परलोक सिधार गए। मोहन के दोनों बेटे देशसेवा कर रहे हैं। भारत पांडे नेवी में कैप्टन हैं और चेतन पांडे आर्मी में कर्नल हैं।
सरस्वती की विरासत को आगे बड़ा रहा पौत्र
सरस्वती पांडे के पौत्र वैभव पांडे मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक हैं। उनकी पहली पुस्तक ''फॉर ए चेंज'' युवाओं को देश के लिए बलिदान देने के लिए प्रेरित करती है। उस पुस्तक में सरस्वती नामक मुख्य पात्र सरस्वती पांडे के जीवन से प्रेरित है। वैभव अपने मोटिवेशनल स्पीच में सरस्वती के बलिदान की गाथा कविताओं के माध्यम से सुनाते हैं।