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बुक सेलरों की दुकानों पर छापा
अमर उजाला ब्यूरो हल्द्वानी
Updated Tue, 11 Apr 2017 01:09 AM IST
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हल्द्वानी में बुकसेलर की दुकान में छापा मारते सिटी मजिस्ट्रेट
- फोटो : अमर उजाला
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निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ अभिभावकों और सामाजिक संगठनों के मुखर होने के बाद आखिरकार स्थानीय प्रशासन की सोमवार को नींद टूटी। प्रशासन ने वाणिज्य कर विभाग के साथ बरेली रोड स्थित दो बुक सेलरों की दुकानों में छापामारी की। टीम ने दुकानों से शहर के नामी पब्लिक स्कूलों की कापी एवं किताबों की लिस्ट बरामद की। दुकान संचालकों से पूछताछ कर स्टेशनरी की खरीद फरोख्त का रिकार्ड जब्त किया।
निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ सामाजिक संगठनों ने मोर्चा खोला है। निजी स्कूल फीस, कापी-किताबें, यूनिफार्म और मेंटीनेंस की आड़ में अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। अभिभावक बच्चों के भविष्य को लेकर खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं। सामाजिक संगठन और पैरेंट एसोसिएशन की तरफ से स्कूलों की लूट खसोट पर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी दबाव में प्रशासन की ओर से स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों के बीच वार्ता हो चुकी है। वार्ता विफल होने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट केके मिश्रा, एसडीएम एपी बाजपेयी के नेतृत्व में वाणिज्य कर विभाग ने सोमवार को बरेली रोड स्थित पूरन एंड संस और टुडेज बुक्स की दुकानों में छापे मारे।
टीम ने करीब एक घंटे तक दुकानों में छानबीन और पूछताछ की। वाणिज्य कर असिस्टेंट कमिश्नर विनय ओझा के मुताबिक दोनों ही किताबों की दुकानों में खरीद फरोख्त का रिकार्ड जांच के लिए जब्त किया गया है। ओझा के मुताबिक दोनों ही दुकानों का वाणिज्य कर विभाग में पंजीकरण है। दुकानों में निजी स्कूलों के कापी किताबों की लिस्ट मिली है। जब्त रिकार्ड की जांच के बाद ही गड़बड़ी का खुलासा हो पाएगा।
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किताबें टैक्स फ्री हैं। लेकिन कापी, पेंसिल, रबड़, कलर और बच्चों से खरीदवाए जाने वाले बाकी सामान टैक्स के दायरे में आते हैं। बुक सेलर इन्हीं सामान में गड़बड़ी करते हैं। इसकी जांच की जाएगी।
- विनय बोझा, असिस्टेंट कमिश्नर, वाणिज्य कर विभाग
बुक सेलरों की मनमानी से अभिभावकों के अलावा प्रशासनिक, वाणिज्य कर और आयकर विभाग के अफसर भी पीड़ित हैं। सभी के बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं। अफसरों को भी बच्चों की कापी किताबें खरीदने पर पक्का बिल नहीं दिया जाता है। अभिभावक जब बिल मांगते हैं तो 14 फीसदी वैट अतिरिक्त जोड़ने की बात कही जाती है, जिससे अभिभावकों की जेब पर और अधिक बोझ पड़ जाता है। इसी के चलते अभिभावक पक्का बिल मांगने की जिद नहीं करते हैं।
बुक सेलर का 90 फीसदी कारोबार कैश पर निर्भर है। किताबों की दुकानों में चेक, स्वाइप और पेटीएम की सुविधा नहीं है। ग्राहकों से कैश लिया जाता है। अधिकांश दुकानदार कैश का जिक्र रिकार्ड में नहीं दर्शाते हैं।
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निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ सामाजिक संगठनों ने मोर्चा खोला है। निजी स्कूल फीस, कापी-किताबें, यूनिफार्म और मेंटीनेंस की आड़ में अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। अभिभावक बच्चों के भविष्य को लेकर खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं। सामाजिक संगठन और पैरेंट एसोसिएशन की तरफ से स्कूलों की लूट खसोट पर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी दबाव में प्रशासन की ओर से स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों के बीच वार्ता हो चुकी है। वार्ता विफल होने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट केके मिश्रा, एसडीएम एपी बाजपेयी के नेतृत्व में वाणिज्य कर विभाग ने सोमवार को बरेली रोड स्थित पूरन एंड संस और टुडेज बुक्स की दुकानों में छापे मारे।
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टीम ने करीब एक घंटे तक दुकानों में छानबीन और पूछताछ की। वाणिज्य कर असिस्टेंट कमिश्नर विनय ओझा के मुताबिक दोनों ही किताबों की दुकानों में खरीद फरोख्त का रिकार्ड जांच के लिए जब्त किया गया है। ओझा के मुताबिक दोनों ही दुकानों का वाणिज्य कर विभाग में पंजीकरण है। दुकानों में निजी स्कूलों के कापी किताबों की लिस्ट मिली है। जब्त रिकार्ड की जांच के बाद ही गड़बड़ी का खुलासा हो पाएगा।
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किताबें टैक्स फ्री हैं। लेकिन कापी, पेंसिल, रबड़, कलर और बच्चों से खरीदवाए जाने वाले बाकी सामान टैक्स के दायरे में आते हैं। बुक सेलर इन्हीं सामान में गड़बड़ी करते हैं। इसकी जांच की जाएगी।
- विनय बोझा, असिस्टेंट कमिश्नर, वाणिज्य कर विभाग
बुक सेलरों की मनमानी से अभिभावकों के अलावा प्रशासनिक, वाणिज्य कर और आयकर विभाग के अफसर भी पीड़ित हैं। सभी के बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं। अफसरों को भी बच्चों की कापी किताबें खरीदने पर पक्का बिल नहीं दिया जाता है। अभिभावक जब बिल मांगते हैं तो 14 फीसदी वैट अतिरिक्त जोड़ने की बात कही जाती है, जिससे अभिभावकों की जेब पर और अधिक बोझ पड़ जाता है। इसी के चलते अभिभावक पक्का बिल मांगने की जिद नहीं करते हैं।
बुक सेलर का 90 फीसदी कारोबार कैश पर निर्भर है। किताबों की दुकानों में चेक, स्वाइप और पेटीएम की सुविधा नहीं है। ग्राहकों से कैश लिया जाता है। अधिकांश दुकानदार कैश का जिक्र रिकार्ड में नहीं दर्शाते हैं।