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देश में धूम मचा रहा चकलुआ में तैयार सेब
प्रकाश नैनवाल /अमर उजाला, कालाढूंगी (नैनीताल)।
Updated Mon, 07 Dec 2015 12:59 AM IST
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देश में पपीते की खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले ‘पपाया मैन’ सुधीर चड्ढा ने अब सेब की उन्नत पौध तैयार कर नया कीर्तिमान बनाया है। उन्होंने चकलुआ में 40 हजार सेब पौध की नर्सरी तैयार की है।
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यहां से वह हिमाचल और जम्मू-कश्मीर भी सरकारी मदद से सेब के पौध की सप्लाई करते हैं। उन्हें इस कार्य के लिए हॉर्टीकल्चर सोसायटी ऑफ इंडिया ने फेलोशिप अवार्ड से नवाजा गया है।
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चकलुआ निवासी सुधीर इंडो डच हॉर्टिकल्चर टेक्नोलॉजी भीमताल में निदेशक हैं। उन्होंने बताया कि 2004 में दिल्ली में लगी सेब प्रदर्शनी में चीन के सेब को देखकर उन्होंने इस सेब को भारत में भी पैदा करने की सोची।
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सात साल की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें इस कार्य में सफलता मिली। आज उनके द्वारा उत्पादित सेब की पौध देश के विभिन्न हिस्सों में धूम मचा रही है और पहाड़ों से पलायन को रोकने में भी मददगार साबित हो रही है। उनके द्वारा विकसित सेब के इस पेड़ की ऊंचाई तीन मीटर है।
इसे गमलों में भी लगाया जा सकता है। यह पेड़ छह महीने के बाद फल देना शुरू कर देता हैं और 18 माह के पेड़ में तीन किलो, तीन वर्ष के पेड़ में 12 किलो, चार वर्ष के पेड़ में 16 किलो, पांच वर्ष के पेड़ में 25 किलो तक फल मिलता है।
उनके द्वारा उत्पादित पौध हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड में बागवानों द्वारा लगाई जा रही है। एक एकड़ में एक हजार पौधों को लगाया जा सकता है। अभी उनकी नर्सरी में सेब की 40 हजार पौध तैयार हो चुकी हैं।
अन्य प्रजातियां जो विदेशों से मंगाई जा रही हैं, उन पौधों को भी उगाने के लिए शोध किया जा रहा हैं। अभी तक उनके द्वारा रेड डेलिसस, फ्यूजी, गाला, कैम्सपर, जैटामाइन, टैप रेड, रेड विलोक्स सेब की प्रजातियां तैयार की जा चुकी हैं।
सुधीर चड्ढा को 1993 में नव परिवर्तनशील कृषक, 2011 में उद्यान रत्न, 2014 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ कृषक और 2015 में हॉर्टिकल्चर सोसायटी ऑफ इंडिया ने फेलोशिप अवार्ड से नवाजा गया है।
कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि पंतनगर के हॉर्टिकल्चर विभागाध्यक्ष डॉ. रंजन श्रीवास्तव कहते हैं कि जो पेड़ सुधीर चड्ढा ने तैयार किया है, यह लगाने के दूसरे साल से फल देना शुरू कर देता है। जबकि सेब की अन्य प्रजातियां पांच साल बाद फल देती हैं। यह उच्च गुणवत्ता के साथ ही उच्च क्वालिटी का है। इसका उत्पादन सामान्य सेब से चार गुना अधिक होता है। घटती जमीन के मद्देनजर यह सेब काफी कारगर साबित होगा।
चौबटिया उद्यान निदेशालय रानीखेत के उद्यान अधीक्षक बीएल वर्मा का कहना है कि तापमान बढ़ने के कारण प्रदेश में सेब का उत्पादन कुछ प्रभावित तो हुआ है, लेकिन रकबा कतई नहीं घटा है। मुनस्यारी, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ में सेब का उत्पादन अच्छा हुआ है, यहां रकबे में भी बढ़ोतरी हुई है।
उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों को सेब के स्वदेशी पौधे निशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। खाद और दवाइयां सब्सिडी पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। गड्ढे खोदने के लिए भी अनुदान दिया जा रहा है। पिछले एक साल से स्वदेशी सेब की प्रजाति के विकास पर कार्य चल रहा है।
इसके तहत यहां चौबटिया उद्यान गार्डन में स्वदेशी सेब की प्रजाति के 2500 पौधे लगाए गए हैं। इस बार भी पौधे लगाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जो किसान स्वयं सेब उगा रहे हैं, उन्हें विभाग पूरी मदद करने को तैयार है।
फोटो- अवार्ड के साथ सुधीर चड्ढा एवं उनकी नर्सरी में तैयार सेब की पौध।