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परेशानी: मुआवजे के मरहम में नहीं अपनी जड़ों से जुदा होने के दर्द का इलाज, विस्थापन की बात सुन भावुक हुए लोग

Mon, 23 Sep 2024 01:52 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: हीरा मेहरा Updated Mon, 23 Sep 2024 01:52 PM IST
सार

अपनी जन्मभूमि को कोई छोड़ना नहीं चाहता, जिस गांव में बचपन बीता, जिन खेतों में किसानी कर परिवार पाला और जिस पुश्तैनी मकान से बेटियों को विदा किया। उस मातृभूमि को छोड़कर तराई में विस्थापित होना पड़ेगा। अपनी यादों को साझा करते हुए हीरा सिंह भावुक हो गए।

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People living in Jamrani Dam submerged area became emotional after hearing about displacement
Jamrani Dam - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 

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जमरानी बांध प्रभावित हीरा सिंह (63) बताते हैं कि हैड़ाखान से प्राइमरी पास करने के बाद वह आठ किलोमीटर दूर ओखलढूंगा पढ़ाई के लिए जाते थे। हैड़ाखान बाबा के कहने पर उन्होंने 1980 में दुकान खोली। आज भी इसी दुकान से परिवार का खर्च चलता है। उन्होंने कहा कि हैड़ाखान मंदिर से भी उनकी यादें जुड़ी हुई हैं लेकिन बांध बनने पर धार्मिक महत्व का ये मंदिर भी जलमग्न हो जाएगा। अब सरकार के हाथ में है कि वह हमें अच्छी जगह विस्थापित करे। वहां बैंक, हॉस्पिटल आदि सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए। जमरानी प्रभावित छह गांवों में कई बुजुर्ग ऐसे हैं जिन्होंने मेहनत मजदूरी कर परिवार को पाला पोसा। सुविधाओं या नौकरी के अभाव में कभी गांव से पलायन नहीं किया। नई पीढ़ी शहरों की ओर पलायन कर रही है लेकिन बुजुर्ग हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे। अब जमरानी बांध इन बुजुर्गों से मातृभूमि की डोर काट देगा।

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तीन बेटे दिल्ली चले गए, तिलवाड़ी में बसा है मोहन का दिल
तिवलाड़ी निवासी मोहन राम (63) ने बताया कि उनके तीन बेटे नौकरी के लिए दिल्ली चले गए और परिवार के साथ वहीं रहते हैं। बच्चों ने दिल्ली आने के लिए कहा लेकिन गांव से दूर जाने का मन नहीं किया। मोहन बताते हैं कि जब वह 10 साल के थे तब से जमरानी बांध बनने की बात सुन रहे हैं। अब बांध बनने जा रहा है और उन्हें तराई में विस्थापित करने की बात हो रही है।

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गांव से जुड़ी है जीवन के संघर्ष की कहानी
गंगराड़ निवासी जीवन सिंह सम्मल का कहना है कि गांव से बचपन के दिन और जीवन के संघर्षों की यादें जुड़ी हैं। अब गांव बांध में डूब जाएगा तो इससे जुड़ी सिर्फ यादें रह जाएंगी। उन्होंने बताया कि गांव में खेती-बाड़ी कर दोनों बच्चों को उचित शिक्षा दी। दोनों देहरादून में नौकरी करते हैं। पुश्तैनी मकान और जमीन भी डूब क्षेत्र में आ रही है। विस्थापन होने पर नई जगह नई जिंदगी शुरू होगी। पुनर्वास स्थल पर सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

पुश्तैनी घर से जुड़ी हैं पूरन की कई यादें
हैड़ाखान में कई दशकों से दर्जी की दुकान चला रहे पूरन राम (72) का कहना है कि पुश्तैनी मकान से माता-पिता की भी यादें जुड़ी हैं। पुराने से लगा नया मकान भी बनाया है। दोनों मकान डूब रहे हैं। एक बेटा फौज में है और दूसरा बेटा मंदिर में ही काम करता है। जीवन के आखिरी पड़ाव में अब गांव छोड़कर दूसरी जगह विस्थापित होना है।

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