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चेक बाउंस मामला : राशि जमा होने पर शिकायतकर्ता की सहमति के बगैर भी दी जा सकती है राहत

Fri, 09 Jan 2026 10:20 AM IST
गायत्री जोशी अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल
अमर उजाला नेटवर्क, नैनीताल Published by: गायत्री जोशी Updated Fri, 09 Jan 2026 10:20 AM IST
सार

चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि आरोपी ने मुआवजे की पूरी राशि जमा कर दी है, तो केवल शिकायतकर्ता की सहमति न होने के आधार पर समझौते (कंपाउंडिंग) की अर्जी को खारिज नहीं किया जा सकता।

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Once the amount is deposited, relief can be granted even without the complainant's consent
सांकेतिक तस्वीर।

विस्तार

 उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आरोपी ने मुआवजे की पूरी राशि जमा कर दी है, तो केवल शिकायतकर्ता की सहमति न होने के आधार पर समझौते (कंपाउंडिंग) की अर्जी को खारिज नहीं किया जा सकता।

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मामले के अनुसार याची संजीव कुमार शर्मा को रुद्रपुर की एक अदालत ने चेक बाउंस के दो अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया था। पहले मामले में आवेदक को एक साल की कैद और 80 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी और दूसरे मामले में डेढ़ साल की कैद और लगभग 2.70 करोड़ रुपये के जुर्माने की सजा दी थी। इन फैसलों के खिलाफ शर्मा ने जिला एवं सत्र न्यायालय, उधम सिंह नगर में अपील दायर की। अपील लंबित रहने के दौरान उन्होंने मुआवजे की पूरी राशि जमा कर दी और मामलों के निपटारे (कंपाउंडिंग) के लिए आवेदन किया। निचली अदालत ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता ने इसके लिए अपनी सहमति नहीं दी थी।

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न्यायमूर्ति आशीष नैथानी के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा कि धारा 138 के तहत अपराध मुख्य रूप से क्षतिपूर्ति प्रकृति के होते हैं, न कि सामाजिक। कानून का मुख्य उद्देश्य शिकायतकर्ता को उसका पैसा वापस दिलाना है, न कि हर मामले में आरोपी को जेल भेजना। जब शिकायतकर्ता को पूरी राशि मिल चुकी है तो मुकदमे से कोई सामाजिक या कानूनी उद्देश्य पूरा नहीं होता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दामोदर एस. प्रभु बनाम सैयद बाबलल मामले का हवाला देते हुए कहा कि अपीलीय स्तर पर भी लागत (कॉस्ट) के साथ समझौते की अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश को रद्द करते हुए दोनों मामलों में समझौते की अनुमति दे दी। कोर्ट ने आवेदक को निर्देश दिया कि वह चेक राशि का 15 प्रतिशत जुर्माना (कॉस्ट ) के रूप में चार सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री की ओर से सूचित सक्षम प्राधिकारी के पास जमा करें।

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