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बड़े गौर से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते

Wed, 29 Apr 2015 01:22 AM IST
गिरीश रंजन तिवारी /अमर उजाला, नैनीताल
गिरीश रंजन तिवारी /अमर उजाला, नैनीताल Updated Wed, 29 Apr 2015 01:22 AM IST
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Older age was listening carefully, you only have so-called Tales say

मेरे 26 वर्षीय पत्रकारिता के दौरान आज लिखना सबसे ज्यादा तब मुश्किल लगा जब संपादक सुनील शाह जी से संबंधित संस्मरण लिखने को कहा गया। मेरे फ्रेंड, फिलासफर, गाइड और संपादक शाह जी के बारे में संस्मरण लिखने पड़ेंगे, वह भी उनके यों चले जाने पर यह कल्पना भयावह है, लेकिन उनके जीवन के कुछ अंश सामने आने जरूरी भी लगते हैं। पत्रकारिता पर उनसे सीखीं जानकारियां ही अब स्मृति शेष हैं।

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उनसे परिचय 25 वर्ष पुराना था। हमेेशा समाचार के लिए जीने वाले शाह जी शारीरिक रूप से बेहद चुस्त, तरोताजा और ऊर्जा से भरपूर नजर आते थे। खबरों को लेकर कल्पना, एंगल और भाषा में उनकी पकड़ का कोई मुकाबला नहीं था लेकिन उनके व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलु उनका सतत अध्ययनशील रहना और हर विषय के बारे में गहरी, तत्थपूर्ण जानकारी रखना था।
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विभिन्न पुस्तकों की कथावस्तु, लेखकों, स्थानों परंपराओं, राजनैतिक घटनाक्रमों के अलावा भी तमाम बीमारियों, दवाओं, एंटीक वस्तुओं, फिल्मों सहित कोई विषय ऐसा नहीं था, जिसमें चर्चा होने पर वे उसी विषय के विशेषज्ञों को अपनी जानकारी से हैरत में न डाल दें। कारों के माडल, इंजन, बाइक यहां तक कि हर तरह की देसी-विदेशी शराब के ब्रांड, उन्हें बनाने वाले देश और उनके पीछे की कथाएं उन्हें विस्तारपूर्वक ज्ञात होती थीं।
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पत्रकारिता के गुण उनमें इस कदर भरे थे कि वे वर्तमान में भले ही हल्द्वानी जैसे शहर में थे, लेकिन वे किसी भी राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार, संपादक से इक्कीस ही बैठते थे। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद दिन भर में 16-17 घंटे काम करना उनकी सामान्य दिनचर्या थी। पत्रकारिता के क्षय के दौर में बीते दशक में वे ईमानदारी की ऐसी मिसाल थे, जिसे देख तमाम अधिकारी, नेता, मंत्री हैरान रहते थे। कभी सत्ता पक्ष या विरोधी दलों की शिकायत करने कोई बड़ा नेता मंत्री उनसे बात करने में घबराता था क्योंकि वे पहले स्वयं उसके तमाम कारनामों को लेकर क्लास लगा देने में रस्तीभर संकोच नहीं करते थे।

यह बेहद दुखद है कि देश में अराजकता, भ्रष्टाचार तक को लेकर व्यक्तिगत रूप से तनाव में आ जाने वाले शाह जी जीवन के इस पड़ाव में कुछ माह पूर्व ही कुछ समस्याओं का निदान होने से कुछ सुकून महसूस कर रहे थे लेकिन शायद सुकून उनकी किस्मत में था ही नहीं, जो ये हादसा हो गया।

कुमाऊं और नैनीताल को लेकर उनकी जानकारी तो जबर्दस्त थी ही यहां से उन्हें बेहद ज्यादा लगाव भी था। क्षेत्र की तमाम समस्याओं को लेकर उन्होंने अनेक अभियान अखबार में चलाए, पत्रकार के साथ ही वह एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी थे और जहां भी जाते खबर और फोटो ढूंढ ही लेते थे। उनकी लिखी तमाम खबरों पर सरकार, प्रशासन यहां तक की हाईकोर्ट तक ने संज्ञान लेकर सुधारात्मक कार्यवाही की लेकिन तमाम दास्तानों का जिक्र करते-करते वे सुनने वालों को छोड़कर चले जाएंगे यह किसी ने सोचा न था...।

अव्यवस्था से चेताते रहे, अव्यवस्था की ही भेंट चढ़े
यह कैसा विचित्र संयोग है कि हल्द्वानी और अन्यत्र यातायात समस्याओं को लेकर बेहद संवेदनशील रहने वाले शाह जी ने अनेक बार इनके बारे में लेख लिखे। डंपरों को ‘यमदूत’ नाम उन्होंने ही दिया। कुछ ही दिन पहले अपने अंतिम लेख इस बार में भी उन्होंने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली असामयिक मृत्यु के बारे में लिखा था।


उसी दौरान बता रहे थे कि सड़क पर हाट मिक्स चढ़ाकर मोटाई बढ़ाई जा रही है साथ की नालियां गहरी होती जा रही हैं जिससे कभी भी दुर्घटना घट सकती है विदेशों में तो पुराना हाटमिक्स उखाड़कर नया किया जाता है और अंत: वे स्वंय ठीक इसी अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। सड़क किनारे की गहरी नाली सूखी पत्तियों से भरी थी पता नहीं लगा कि वहां सड़क नहीं है और उसी नाली में पहिया जाने से उनकी गाड़ी पलट कर दुर्घटनाग्रस्त हो गई जिसके बाद लगातार स्वास्थ्य गिरने से सप्ताहभर के भीतर वे सबको अकेला छोड़ गए....।

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