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हिमालय पर मंडराते संकट पर चिंता
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी।
Updated Wed, 08 Jun 2016 12:20 AM IST
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हिमालय पर संकट बढ़ रहा है। हिमालय के संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया तो देश की एक तिहाई आबादी से ज्यादा को पानी देने वाली गंगा ही खत्म हो जाएगी। यह बात नैनीताल के उमागढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में सोमवार को हुई कार्यशाला में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल मिश्र ने कही।
कार्यशाला का आयोजन हरित स्वराज संवाद की तरफ से किया गया था। कार्यशाला में तय हुआ कि नौ सितंबर को नई दिल्ली में हिमालय दिवस के मौके पर पहाड़ के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्त्ता और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले पहाड़ पर मंडराते संकट का ब्यौरा देंगे। कार्यशाला में पानी और जंगल के मुद्दे पर काम करने वाले सच्चिदानंद भारती और जंगल के विशेषज्ञ विनोद पांडे कार्यशाला के मुख्य वक्ता थे। भारती ने कहा कि हिमालय से मनुष्य का संबंध हजारों साल पुराना है। ज्यादातर धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। लेकिन हिमालय आज संकट में है। इनमें कुछ प्राकृतिक तो कुछ मानव निर्मित संकट हैं। जगह-जगह बादल फटना, जंगल में आग लगना इसी का नतीजा है।
हिमालय क्षेत्र की तीन प्रमुख नदियां और नदी प्रणाली गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु हैं जो देश की 42 से 47 फीसदी आबादी का भरण पोषण करती हैं। अब ये संकट में हैं। हिमालय की समय पर सुध नहीं ली गई तो न गंगा बचेगी न सिंधु।
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कार्यशाला के दूसरे सत्र में विनोद पांडे ने कहा कि पेड़ लगाने से जंगल नहीं बनता। जंगल कई सौ सालों में प्रकृति बनाती है। जंगल का अर्थ सिर्फ शेर, बाघ और हिरन नहीं हैं। इसमें मेंढक भी होते हैं तो हजारों कीटों को खाने वाले चमगादड़ और पशु पक्षी भी। समूची जैव श्रंखला होती है। इसलिए जंगल को मनुष्य की जरूरत के हिसाब से बचाया जाना चाहिए सरकार के हिसाब से नहीं।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता पूर्व राजदूत और विदेश सचिव रहे शशांक और दूसरे सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्विद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष और जानी मानी आलोचक निर्मला जैन ने की। इस मौके पर आईटीएम विवि के कुलपति रमा शंकर सिंह, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विवि के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय, उत्तर प्रदेश के पूर्व आईजी शैलेंद्र प्रताप सिंह, पत्रकार अंबरीश कुमार, रजनीकांत मुद्गल, सुप्रिया राय, सविता वर्मा, राजस्थान के पूर्व मुख्य फारेस्ट कंजरवेटर राजेश भंडारी मौजूद थे ।
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कार्यशाला का आयोजन हरित स्वराज संवाद की तरफ से किया गया था। कार्यशाला में तय हुआ कि नौ सितंबर को नई दिल्ली में हिमालय दिवस के मौके पर पहाड़ के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्त्ता और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले पहाड़ पर मंडराते संकट का ब्यौरा देंगे। कार्यशाला में पानी और जंगल के मुद्दे पर काम करने वाले सच्चिदानंद भारती और जंगल के विशेषज्ञ विनोद पांडे कार्यशाला के मुख्य वक्ता थे। भारती ने कहा कि हिमालय से मनुष्य का संबंध हजारों साल पुराना है। ज्यादातर धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। लेकिन हिमालय आज संकट में है। इनमें कुछ प्राकृतिक तो कुछ मानव निर्मित संकट हैं। जगह-जगह बादल फटना, जंगल में आग लगना इसी का नतीजा है।
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हिमालय क्षेत्र की तीन प्रमुख नदियां और नदी प्रणाली गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु हैं जो देश की 42 से 47 फीसदी आबादी का भरण पोषण करती हैं। अब ये संकट में हैं। हिमालय की समय पर सुध नहीं ली गई तो न गंगा बचेगी न सिंधु।
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कार्यशाला के दूसरे सत्र में विनोद पांडे ने कहा कि पेड़ लगाने से जंगल नहीं बनता। जंगल कई सौ सालों में प्रकृति बनाती है। जंगल का अर्थ सिर्फ शेर, बाघ और हिरन नहीं हैं। इसमें मेंढक भी होते हैं तो हजारों कीटों को खाने वाले चमगादड़ और पशु पक्षी भी। समूची जैव श्रंखला होती है। इसलिए जंगल को मनुष्य की जरूरत के हिसाब से बचाया जाना चाहिए सरकार के हिसाब से नहीं।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता पूर्व राजदूत और विदेश सचिव रहे शशांक और दूसरे सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्विद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष और जानी मानी आलोचक निर्मला जैन ने की। इस मौके पर आईटीएम विवि के कुलपति रमा शंकर सिंह, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विवि के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय, उत्तर प्रदेश के पूर्व आईजी शैलेंद्र प्रताप सिंह, पत्रकार अंबरीश कुमार, रजनीकांत मुद्गल, सुप्रिया राय, सविता वर्मा, राजस्थान के पूर्व मुख्य फारेस्ट कंजरवेटर राजेश भंडारी मौजूद थे ।