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कैंसररोधी वनस्पति खीचर विलुप्ति के कगार पर

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Wed, 07 Aug 2019 10:36 PM IST
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kainsararodhee vanaspati kheechar vilupti ke kagaar par
खीचर वनस्पति का पौधा। - फोटो : PITHORAGARH
प्रदेश का हिमालयी क्षेत्र दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में कैंसर रोधी वनस्पति खीचर भी पाई जाती है जो कि कैंसर को रोकने में कारगर मानी जाती है। इस वनस्पति से चीन और भारत में बॉयोटिक दवा बनाई जाती है। जानकारों की मानें तो संरक्षण के अभाव में यह वनस्पति अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।
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खीचर का वानस्पतिक नाम लाइसियम रूधेनिसियम है। भारत में यह मुख्य रूप से लद्दाख की नुद्रा घाटी और कुमाऊं, गढ़वाल के हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती है। झाड़ीनुमा इस पौधे में जून से अगस्त में फूल आते हैं। इस वनस्पति को खीचर, खितसर, कितसरमा, ब्लैक गोजी नाम से भी जाना जाता है। यह पाकिस्तान, कजाकिस्तान, मंगोलिया, चीन, दक्षिणी-पूर्वी रूस, तजाकित्सान, उजबेकिस्तान में भी पाई जाती है।
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काफी वर्ष पहले बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इस वनस्पति की पहचान की थी और संरक्षण के अभाव में इस वनस्पति के लुप्त होने की भी आशंका प्रकट की थी। देश के जाने-माने आयुर्वेदाचार्यों में शुमार उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय देहरादून के डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) बताते हैं कि यह वनस्पति शरीर में स्थित कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि रोकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण नष्ट होते वासस्थलों और संरक्षण होने से खीचर दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में आ रही है। वैज्ञानिक इस वनस्पति को संरक्षित करने की पहल कर रहे हैं, जिससे खीचर के संरक्षण की उम्मीद जगी है।
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नपुंसकता और बांझपन में भी है कारगर
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के डॉ. नवीन जोशी (एमडी आयुर्वेद) बताते हैं कि अद्भुत जड़ी खीचर का नपुंसकता और बांझपन में भी उपयोग होता है। इसके फल फैटी एसिड के स्रोत हैं। इसमें प्लेवनॉयड्स और अन्य बॉयोएक्टिव पदार्थ पाए जाते हैं। चीन में इसके फलों से ब्लैक गोजी नाम से दवाई बनाई जाती है। भारत में खीचर से ब्लैक गोजी टिंचर नाम से बॉयोकेमिक दवा बनती है।
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