Uk: याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से बहाल करने के निर्देश, एकलपीठ के समक्ष मामले की हुई सुनवाई
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में जूनियर इंजीनियर (सिविल) के पद पर कॉन्ट्रैक्ट बेस पर नियुक्त याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए है।
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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में जूनियर इंजीनियर (सिविल) के पद पर कॉन्ट्रैक्ट बेस पर नियुक्त याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए है।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार उत्तरकाशी निवासी त्रेपन सिंह राणा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उसे 2009 में पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में जूनियर इंजीनियर (सिविल) के पद पर कॉन्ट्रैक्ट बेस पर नियुक्त किया गया था और समय-समय पर कॉन्ट्रैक्ट की अवधि बढ़ाई गई। याचिका में कहा कि याचिकाकर्ता को 11 अगस्त व 20 अगस्त 2014 को रेगुलराइजेशन के लिए संस्तुति की गई थी, हालांकि जब रेगुलराइजेशन की कार्यवाही चल रही थी, तो याचिकाकर्ता को विजिलेंस डिपार्टमेंट ने पकड़ लिया बाद में पीसी एक्ट के तहत चार्ज लगाया गया और अब स्पेशल जज (विजिलेंस) एंटी-करप्शन, देहरादून की कोर्ट में ट्रायल चल रहा है। इसके बाद 24 मार्च 2017 के एक ऑफिस मेमोरेंडम द्वारा कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के तहत याचिकाकर्ता की कॉन्ट्रैक्ट वाली नियुक्ति रद्द कर दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के क्लॉज 7(3) का इस्तेमाल प्रतिवादियों द्वारा गलत तरीके से किया गया था क्योंकि ट्रायल अभी भी चल रहा है। याचिका में कहा कि प्रतिवादियों द्वारा कभी भी कोई कार्यवाही नहीं की गई थी और केवल कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के 7(3) के आधार पर याचिकाकर्ता को सेवा से हटा दिया गया है। प्रतिवादी की ओर से जवाब दाखिल कर कहा गया कि उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की क्योंकि याचिकाकर्ता नियमित कर्मचारी नहीं था और ट्रायल के दौरान उसे सस्पेंड करने का कोई प्रावधान नहीं था इसलिए उसे कॉन्ट्रैक्ट के क्लॉज़ 7(3) का हवाला देकर सेवा से हटा दिया गया।
इस प्रकरण पर अतिरिक्त सचिव पीडब्लूडी विभाग वीसी के माध्यम से कोर्ट में पेश हुए और कहा कि याचिकाकर्ता के आचरण के कारण, जिसे सतर्कता विभाग ने पकड़ा था, विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के क्लॉज़ 7(3) का हवाला देकर उसे सेवा से हटा दिया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट के तहत यह स्पष्ट है कि इस क्लॉज को तभी रद्द किया जा सकता है जब संबंधित व्यक्ति दोषी ठहराया गया हो। यहां इस मामले में यह स्वीकार किया गया है कि याचिकाकर्ता अभी भी ट्रायल का सामना कर रहा है और उसे अभी तक न तो बरी किया गया है और न ही दोषी ठहराया गया है इसलिए केवल इस आधार पर कि ट्रायल चल रहा है , याचिकाकर्ता को सेवा से नहीं हटाया जा सकता। याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी विभागीय कार्यवाही शुरू नहीं की गई। कोर्ट ने 24 मार्च 2017 के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तुरंत बहाल करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि बहाली देहरादून के चौथे अतिरिक्त सेशन जज की अदालत में लंबित आपराधिक ट्रायल अंतिम परिणाम के अधीन होगी।