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इला चंद्र जोशी स्मरण संगोष्ठी
ब्यूरो/अमर उजाला, नैनीताल।
Updated Thu, 17 Dec 2015 01:47 AM IST
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कुविवि में इलाचंद्र जोशी स्मरण संगोष्ठी नए साहित्यकारों, शोधार्थियों को समकालीन साहित्यकार महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत और इलाचंद्र जोशी जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं से अवगत कराते हुए उन पर चर्चा करने के संकल्प के साथ संपन्न हुई।
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संगोष्ठी में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से साहित्य पुरस्कार लेने और उन्हें साहित्य पुरस्कारों से सम्मानित किए जाने से बचने के सुझाव दिए गए। वक्ताओं ने बाजारवाद के दबाव के बावजूद वर्तमान साहित्य का भविष्य और परिदृश्य उज्ज्वल है।
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वरिष्ठ कथाकार नवीन कुमार नैथानी का कहना है कि समकालीन हिंदी कहानी में काफी कुछ निराशा जैसी स्थिति नहीं है। कथाकार नैथानी मंगलवार को केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा और महादेवी वर्मा सृजन पीठ की ओर से आयोजित इलाचंद्र जोशी स्मरण हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे।
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कुविवि के हरमिटेज भवन में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए महादेवी वर्मा सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में बाजारवाद के हावी होने के बावजूद साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है।
नए कथाकार और शोधार्थियों को समकालीन साहित्यकारों महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं के प्रति और अधिक सजगता से काम करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
संगोष्ठी में संकल्प लिया गया कि इन महान साहित्यकारों के पदचिह्नों पर चलकर साहित्य की सेवा की जाएगी। समालोचक डा. साधना अग्रवाल ने कहा कि कहानीकारों के समक्ष यथार्थ को समझने व पाठकों को समझाने की बड़ी चुनौैती है। बाजार के दबाव में कहानी लिखी जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि सामाजिक मूल्यों के बजाए बाजार वाद, भूमंडलीकरण, आतंकवाद और सांप्रदायिकता के अलावा प्रेम जैसे विषय कहानी के केंद्र में आ गए हैं। समीक्षक डा. सिद्धेश्वर सिंह ने नया समय और दूसरी दुनिया कहानियों के जरिए कथा साहित्य के समकालीन परिदृश्य के बारे में बताया।
उन्होंने कहा कि कहानी समाज के बदलने से बदली है। आज के कहानीकार को इस बदले समाज की अभिव्यक्ति करने के लिए यथार्थवाद का अतिक्रमण करना होगा। वरिष्ठ लेखिका किरण अग्रवाल ने समाज के मुख्य सरोकारों मेें से लेखन के गायब होने पर चिंता जताई।
कथाकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि कहानी और कविता की निराशाजनक स्थिति के लिए ऐसे रचनाकार जिम्मेदार हैं जो अपराधियों तक से पुरस्कार लेने से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। दिनेश चंद्र जोशी ने कहानियों के साथ बेवजह के प्रयोग कर कहानी को और जटिल बनाने पर चिंता जताई।
सृजनपीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि कहानी का काम मनुष्य की धड़कनों को आकार देना है। इससे पूर्व युवा कथाकार दिनेश कर्नाटक, स्वाति मेलकानी, महावीर खाल्टा, डा. अनिल कार्की, खेमकरण सोनम, डा. आरीत स्मित, शालिनी मिश्रा, डा. माया गोला और पवनेश ठकुराठी ने स्वरचित कहानियों का पाठ किया।
इस मौके पर केंद्रीय साहित्य अकादमी के पूर्व उपसचिव ब्रजेंद्र त्रिपाठी, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.नीरजा टंडन, प्रो.चंद्रकला रावत, प्रो. निर्मला ढैला बोरा, प्रो.राजेेश्वरी पंत, डा. सावित्री कैड़ा जंतवाल, बीपी जोशी, डा. शुभा मटियानी, डा. शशि पांडे, डा. विानी रावत, डा.दीपा कांडपाल, डा. मन्नू ढौडियाल समेत कई लोग मौजूद थे।