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अब सिंचाई नहरों, पंपों की जगह लेंगी हाइड्रोजैल पानी से बनी गोलियां
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जल वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई हाइड्रोजैल (पानी) की गोलियां।
- फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। नहरों में पानी नहीं आ रहा, खेतों में सिंचाई कैसे करें। किसानों की ये समस्या आम है। त्रिपुरा विश्वविद्यालय ने इस समस्या का तोड़ निकाला है। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण, सतत विकास संस्थान कोसी-कटारमल के राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत त्रिपुरा विश्वविद्यालय ने हाइड्रोजैल अर्थात पानी की गोली बना ली है। चार किलो हाइड्रोजैल से एक हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की जा सकती है।
वर्ष 2018-19 में भारत सरकार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत जमीन की सिंचाई में पानी की बर्बादी को रोकने, सूखे की मार को कम करने, उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से यह शोध परियोजना स्वीकृत की गई थी। जीबी पंत संस्थान की ओर से प्रयोगशाला अनुसंधान पर आधारित इस परियोजना पर त्रिपुरा विश्वविद्यालय में अनुसंधान कराया गया। गहन अनुसंधान के बाद विश्वविद्यालय के कैमिकल और पॉलीमर इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. सचिन भलाधरे के नेतृत्व में जल वैज्ञानिकों ने हाइड्रोेजैल बनाने में सफलता अर्जित की है। अनुसंधान के अनुसार हाइड्रोजैल से निर्धारित मात्रा में पानी वितरण के कारण धरती में पानी का ठहराव 50 से 70 प्रतिशत बढ़ जाता है। मिट्टी का घनत्व भी 10 प्रतिशत तक कम होता है।
जल वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार यह जैल देने से अर्ध शुष्क और शुष्क भागों में खेती पर चमत्कारी प्रभाव आने की संभावना है। यह मिट्टी में वाष्पीकरण, बनावट आदि को भी प्रभावित कर रहा है। लगातार पानी मिलने से खेतों में उपज तो बढ़ेगी ही साथ ही बीज, फूल और फलों की गुणवत्ता के साथ सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां भी बढ़ जाएंगी। सूखे से भी खेती बची रहेगी। फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने में कारगर होंगी। प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले सेल्यूलोज आधारित हाइड्रोजैल आसानी से प्रकृति में सूर्य के प्रकाश में क्षय हो जाते हैं और इनसे कोई पर्यावरण प्रदूषण भी नहीं होता। यह आसानी से पानी को सोख सकता है और पानी का रिसाव भी कर सकता है। 35 से 40 सेल्सियस में यह हाइड्रोजैल प्रभावी ढंग से कारगर है। (संवाद)
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जैल की गोलियां मिट्टी में आठ माह से एक साल तक हो सकती हैं कारगर
अल्मोड़ा। जैल में पानी भरने अथवा फूलने की क्षमता उसके शुष्क भार से 400 गुना तक अधिक है। यह धीरे-धीरे पौधों की जड़ों तक पानी छोड़ने में कारगर है। एक से चार किलो हाइड्रोजैल से एक हेक्टेयर भूमि में सिंचाई संभव है। जैल की गोलियां मिट्टी में आठ महीने से एक साल तक कारगर हो सकती हैं। इसके प्रयोग से कृषि में 30 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि का अनुमान है। अनुसंधान में जुटे वैज्ञानिक रूई से भी सेल्यूलोज नेनोक्रिस्टल निकालने में सफलता अर्जित कर चुके हैं। लगातार अनुसंधान से अब इन हाइड्रोजैल गोलियों की अवशोषण क्षमता को 600 प्रतिशत तक बढ़ाने में सफलता मिल गई है। यह अनुसंधान प्रयोगशाला से बाहर आते ही कृषि क्षेत्र के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। (संवाद)
पानी का हो सकेगा सही उपयोग
अल्मोड़ा। देश में 52 प्रतिशत खेती भूमि बारिश पर निर्भर है तो 42 प्रतिशत भूमि सूखे की मार से जूझती है। देश में विश्व की 18 प्रतिशत आबादी रहती है। जबकि विश्व स्वच्छ जल का केवल चार प्रतिशत भारत में है। इसका 80 प्रतिशत भाग खेती में उपयोग होता है। विभिन्न कारणों से इस पानी के 18 से 20 प्रतिशत भाग का ही सही उपयोग हो पाता है। भारत में आंध्रप्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना क्षेत्रों में देश की 40 प्रतिशत आबादी यानी करीब 50 करोड़ से अधिक लोग और कृषि किसी न किसी रूप में सूखे की मार झेलती है और हर साल बड़ी संख्या में किसान अपना जीवन गंवाते हैं। (संवाद)
कोट
यह अनुसंधान काफी उत्साहजनक है। आने वाले समय में इन हाइड्रोजैल को और प्रभावी बनाना और इसे कृषि अनुप्रयोग में ले जाना चुनौतिपूर्ण है। इसके लिए अनुसंधान और प्रशिक्षण सामग्री तैयार की जा रही है।
-डॉ सचिन भलाधरे, परियोजना प्रमुख
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार के मार्ग निर्देशन में यह परियोजना संचालित है। कृषि क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान की दिशा में यह तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान, जल संरक्षण के लिए उम्मीदों और अपेक्षाओं से भरा अनुसंधान है। इसके अनुप्रयोग को लेकर सभी उत्साहित हैं।
इं. किरीट कुमार, नोडल अधिकारी राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन
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वर्ष 2018-19 में भारत सरकार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत जमीन की सिंचाई में पानी की बर्बादी को रोकने, सूखे की मार को कम करने, उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से यह शोध परियोजना स्वीकृत की गई थी। जीबी पंत संस्थान की ओर से प्रयोगशाला अनुसंधान पर आधारित इस परियोजना पर त्रिपुरा विश्वविद्यालय में अनुसंधान कराया गया। गहन अनुसंधान के बाद विश्वविद्यालय के कैमिकल और पॉलीमर इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. सचिन भलाधरे के नेतृत्व में जल वैज्ञानिकों ने हाइड्रोेजैल बनाने में सफलता अर्जित की है। अनुसंधान के अनुसार हाइड्रोजैल से निर्धारित मात्रा में पानी वितरण के कारण धरती में पानी का ठहराव 50 से 70 प्रतिशत बढ़ जाता है। मिट्टी का घनत्व भी 10 प्रतिशत तक कम होता है।
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जल वैज्ञानिकों के अनुसार लगातार यह जैल देने से अर्ध शुष्क और शुष्क भागों में खेती पर चमत्कारी प्रभाव आने की संभावना है। यह मिट्टी में वाष्पीकरण, बनावट आदि को भी प्रभावित कर रहा है। लगातार पानी मिलने से खेतों में उपज तो बढ़ेगी ही साथ ही बीज, फूल और फलों की गुणवत्ता के साथ सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां भी बढ़ जाएंगी। सूखे से भी खेती बची रहेगी। फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने में कारगर होंगी। प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाले सेल्यूलोज आधारित हाइड्रोजैल आसानी से प्रकृति में सूर्य के प्रकाश में क्षय हो जाते हैं और इनसे कोई पर्यावरण प्रदूषण भी नहीं होता। यह आसानी से पानी को सोख सकता है और पानी का रिसाव भी कर सकता है। 35 से 40 सेल्सियस में यह हाइड्रोजैल प्रभावी ढंग से कारगर है। (संवाद)
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जैल की गोलियां मिट्टी में आठ माह से एक साल तक हो सकती हैं कारगर
अल्मोड़ा। जैल में पानी भरने अथवा फूलने की क्षमता उसके शुष्क भार से 400 गुना तक अधिक है। यह धीरे-धीरे पौधों की जड़ों तक पानी छोड़ने में कारगर है। एक से चार किलो हाइड्रोजैल से एक हेक्टेयर भूमि में सिंचाई संभव है। जैल की गोलियां मिट्टी में आठ महीने से एक साल तक कारगर हो सकती हैं। इसके प्रयोग से कृषि में 30 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि का अनुमान है। अनुसंधान में जुटे वैज्ञानिक रूई से भी सेल्यूलोज नेनोक्रिस्टल निकालने में सफलता अर्जित कर चुके हैं। लगातार अनुसंधान से अब इन हाइड्रोजैल गोलियों की अवशोषण क्षमता को 600 प्रतिशत तक बढ़ाने में सफलता मिल गई है। यह अनुसंधान प्रयोगशाला से बाहर आते ही कृषि क्षेत्र के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। (संवाद)
पानी का हो सकेगा सही उपयोग
अल्मोड़ा। देश में 52 प्रतिशत खेती भूमि बारिश पर निर्भर है तो 42 प्रतिशत भूमि सूखे की मार से जूझती है। देश में विश्व की 18 प्रतिशत आबादी रहती है। जबकि विश्व स्वच्छ जल का केवल चार प्रतिशत भारत में है। इसका 80 प्रतिशत भाग खेती में उपयोग होता है। विभिन्न कारणों से इस पानी के 18 से 20 प्रतिशत भाग का ही सही उपयोग हो पाता है। भारत में आंध्रप्रदेश, बिहार, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना क्षेत्रों में देश की 40 प्रतिशत आबादी यानी करीब 50 करोड़ से अधिक लोग और कृषि किसी न किसी रूप में सूखे की मार झेलती है और हर साल बड़ी संख्या में किसान अपना जीवन गंवाते हैं। (संवाद)
कोट
यह अनुसंधान काफी उत्साहजनक है। आने वाले समय में इन हाइड्रोजैल को और प्रभावी बनाना और इसे कृषि अनुप्रयोग में ले जाना चुनौतिपूर्ण है। इसके लिए अनुसंधान और प्रशिक्षण सामग्री तैयार की जा रही है।
-डॉ सचिन भलाधरे, परियोजना प्रमुख
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार के मार्ग निर्देशन में यह परियोजना संचालित है। कृषि क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान की दिशा में यह तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान, जल संरक्षण के लिए उम्मीदों और अपेक्षाओं से भरा अनुसंधान है। इसके अनुप्रयोग को लेकर सभी उत्साहित हैं।
इं. किरीट कुमार, नोडल अधिकारी राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन