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वित्तीय अनियमितता मामले में हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को दिए व्यक्तिगत शपथपत्र देने के निर्देश
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नैनीताल। हाईकोर्ट ने राज्य में वित्तीय लेन-देन डिजिटल माध्यम से करने के लिए राज्य सरकार की ओर से अधिकृत की गई कंपनी के वित्तीय अनियमितता करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून की आरटीआई कार्यकर्ता सीमा भट्ट ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के निर्देशों के क्रम में राज्य सरकार ने शुरू में डिजिटल लेनदेन नेशनल इनफॉर्मेटिक सेंटर (एनआईसी) के माध्यम से किया, लेकिन बाद में इस कार्य के लिए टेंडर निकाला गया। जिस कंपनी के नाम टेंडर हुआ वह ब्लैक लिस्ट हो गई।
याचिका में कहा कि उसके बाद फिर टेंडर व अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बजाय सरकार ने एक अन्य कंपनी को यह काम सौंप दिया। इस कंपनी को पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों के लेनदेन की इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग करने का ज्ञान नहीं था। जिस कारण कंपनी की ओर बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार की ओर से एक व्यक्ति को 14 हजार का भुगतान करना था जिसे इस कंपनी ने एक करोड़ का भुगतान कर दिया। इसी तरह कई विभागों के कर्मचारियों के खाते में एक माह के बजाय तीन माह का वेतन चला गया है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र पेश करने के निर्देश दिए।
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मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून की आरटीआई कार्यकर्ता सीमा भट्ट ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के केंद्र सरकार के निर्देशों के क्रम में राज्य सरकार ने शुरू में डिजिटल लेनदेन नेशनल इनफॉर्मेटिक सेंटर (एनआईसी) के माध्यम से किया, लेकिन बाद में इस कार्य के लिए टेंडर निकाला गया। जिस कंपनी के नाम टेंडर हुआ वह ब्लैक लिस्ट हो गई।
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याचिका में कहा कि उसके बाद फिर टेंडर व अन्य प्रक्रियाएं पूरी करने के बजाय सरकार ने एक अन्य कंपनी को यह काम सौंप दिया। इस कंपनी को पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों के लेनदेन की इंटीग्रेटेड मॉनिटरिंग करने का ज्ञान नहीं था। जिस कारण कंपनी की ओर बड़े स्तर पर वित्तीय गड़बड़ियां की जा रही हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि सरकार की ओर से एक व्यक्ति को 14 हजार का भुगतान करना था जिसे इस कंपनी ने एक करोड़ का भुगतान कर दिया। इसी तरह कई विभागों के कर्मचारियों के खाते में एक माह के बजाय तीन माह का वेतन चला गया है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मुख्य सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र पेश करने के निर्देश दिए।
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