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एसएसजे विवि में वीसी की नियुक्ति को हाईकोर्ट में चुनौती
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नैनीताल। एनएस भंडारी को सोबन सिंह जीना विवि का कुलपति बनाए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले में दायर जनहित याचिका पर बुधवार को हुई सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने उन विपक्षियों से तीन सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए कहा है जिन्होंने अब तक अपना जवाब नहीं दिया है।
पूर्व में कोर्ट ने वाइस चांसलर एनएस भडारी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। याचिकाकर्ता ने याचिका में राज्य सरकार, लोक सेवा आयोग, कुमाऊं विश्वविद्यालय, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा व वाइस चांसलर एनएस भंडारी को पक्षकार बनाया था।
मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी रवींद्र जुगरान ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के नवनियुक्त वाइस चांसलर एनएस भंडारी की नियुक्ति यूजीसी के नियमावली को दरकिनार करके की है। याचिकाकर्ता का कहना था कि यूजीसी की नियमावली के अनुसार वाइस चांसलर नियुक्त होने के लिए दस वर्ष की प्रोफेसरशिप होनी आवश्यक है जबकि एनएस भंडारी की प्रोफेसरशिप साढ़े आठ वर्ष की है।
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बाद में प्रोफेसर भंडारी उत्तराखंड पब्लिक सर्विस कमीशन के मेंबर नियुक्त हो गए थे। उस दौरान की सेवा उनकी प्रोफेशरशिप में नहीं जोड़ी जा सकती है इसलिए उनकी नियुक्ति अवैध है और उनको पद से हटाया जाए।
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पूर्व में कोर्ट ने वाइस चांसलर एनएस भडारी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। याचिकाकर्ता ने याचिका में राज्य सरकार, लोक सेवा आयोग, कुमाऊं विश्वविद्यालय, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा व वाइस चांसलर एनएस भंडारी को पक्षकार बनाया था।
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मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार देहरादून निवासी रवींद्र जुगरान ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के नवनियुक्त वाइस चांसलर एनएस भंडारी की नियुक्ति यूजीसी के नियमावली को दरकिनार करके की है। याचिकाकर्ता का कहना था कि यूजीसी की नियमावली के अनुसार वाइस चांसलर नियुक्त होने के लिए दस वर्ष की प्रोफेसरशिप होनी आवश्यक है जबकि एनएस भंडारी की प्रोफेसरशिप साढ़े आठ वर्ष की है।
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बाद में प्रोफेसर भंडारी उत्तराखंड पब्लिक सर्विस कमीशन के मेंबर नियुक्त हो गए थे। उस दौरान की सेवा उनकी प्रोफेशरशिप में नहीं जोड़ी जा सकती है इसलिए उनकी नियुक्ति अवैध है और उनको पद से हटाया जाए।