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वेस्ट प्लास्टिक से बनाया जाएगा ग्राफीन

Tue, 31 Dec 2019 12:48 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: हल्द्वानी ब्यूरो Updated Tue, 31 Dec 2019 12:48 AM IST
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graphine will be developed through waste plastics
कुलपति प्रो. केएस राना। - फोटो : NAINITAL

वेस्ट प्लास्टिक का सदुपयोग कर रसायन विज्ञान के शोधार्थी ग्राफीन तैयार करेंगे। इस संबंध में सोमवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन स्थित सभागार में राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास परिषद नई दिल्ली, राष्ट्रीय हिमालयन अध्ययन मिशन (एनएमएचएस) कोसी कटारमल और हैक्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच बैठक हुई। बैठक में तीनों के मध्य तकनीकी हस्तांतरण पर करार हुआ।

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सोमवार को रसायन विभाग की ओर से आयोजित बैठक की अध्यक्षता कुलपति प्रो. केएस राना ने की। इस दौरान परियोजना निदेशक अक्षत साह ने कहा कि वेस्ट प्लास्टिक कचरे से बहुमूल्य ग्राफीन का उत्पादन किया जाएगा। प्रो. नंद गोपाल साहू के निर्देशन में शोधार्थियों ने यह तकनीक को विकसित की है, जिससे व्यर्थ प्लास्टिक से ग्राफीन सरल और सस्ती पद्धति से बनाई जाएगी।
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कुलपति प्रो. राना ने बताया विवि की बड़ी उपलब्धि
कुमाऊं विवि के कुलपति प्रो. केएस राना ने इस कार्य को बड़ी उपलब्धि बताया है। प्रो. राना ने कहा कि 2.50 करोड़ के इस प्रोजेक्ट से निर्माण कार्य होंगे। रिसर्च को पब्लिक यूटिलिटी में लाने के संबंध में कार्य होंगे। कहा कि मार्केट में एक किलोग्राम ग्राफीन की कीमत लगभग 40 हजार रुपये है।
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बुलेट प्रूफ जैकेट बनाएं जाएंगे : प्रो. साहू
प्रो. नंद गोपाल साहू के अनुसार ग्राफीन से बुलेट प्रूफ जैकेट बनाएं जाएंगे, जो अन्य जैकेटों से हल्के होंगे। साथ ही नैनीताल शहर एक प्लास्टिक मुक्त शहर होगा। भविष्य में युवाओं को इससे नए आयाम प्राप्त होंगे। ग्राफीन का उपयोग कर सड़कों की लाइफ दस गुना बढ़ाई जा सकती है।

भविष्य में दिखेंगे अच्छे परिणाम : परियोजना निदेशक
परियोजना निदेशक अक्षत साह ने कहा कि देश के बड़े उद्योग समूहों के साथ हस्तांरण किया गया है। ग्राफीन से फ्यूल, वाटर फिल्टर आदि सामग्री बनाई जाएगी। नगर के साथ ही देशवासियों के आम लोगों को भी अत्याधुनिक तकनीक का लाभ मिलेगा।

बैठक में ये रहे मौजूद
वित्त अधिकारी दिनेश कुमार राना, डिप्टी रजिस्टार केआर भट्ट, नोडल अधिकारी रूसा प्रो. अतुल जोशी, एनआरडीसी चैयरमैन एच पुरुषोत्तम, डीसी जोशी, एनएमएचसी नोडल अधिकारी प्रोजेक्ट इंजीनियर कीरीट कुमार, प्रो. एनजी साहू, प्रो. एबी मेलकानी, प्रो. राजीव उपाध्याय, विधान चौधरी, हैक्स कंपनी के चैयरमैन अक्षत साह, मारुति नंदन साह, मनोज, संदीप, सुनील, जगदीश पांडे, विक्रम कार्की, संजय पंत, दीवान, राजेंद्र, विनयदीप पुनेठा आदि।

सफलता की कहानी चार साल लगे ग्राफीन बनाने में 
कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के रसायन विभाग के शोधार्थियों को चार साल बाद सफलता हासिल हुई है। शोधार्थियों ने वेस्ट प्लास्टिक ग्राफीन बनाने के लिए वर्ष 2015 से पहल शुरू की थी। इस दौरान उनके पास लैब तक की सुविधा नहीं थी। प्रयोगशाला के लिए फंड न होने पर शोधार्थियों ने आपस में पांच हजार रुपये जमा कर लोहे की भट्टी तैयार कराई। शोधार्थियों के प्रयास रंग लाने के बाद वह खुशी से झूम उठे।

शोधार्थी सुनील ढाली ने बताया कि वर्ष 2015 में रसायन विभाग में लैब समेत अन्य सुविधाओं की कमी थी। बावजूद हमने ग्राफीन बनाने का काम शुरू किया, जो काफी जोखिम भरा था। प्रो. नंद गोपाल साहू, संदीप पांडे, मनोज कालाकोटी ने पैसे जमा कर लोहे की भट्टी बनवाकर ग्राफीन बनाने का काम शरू किया। वर्ष 2016 में लैब के फंड से नई डिजाइन की फर्निस (लोहे की भट्टी) तैयार की गई। 2016 जनवरी में एक बार यह प्रयोग असफल रहा।

मार्च 2016 में नई भट्टी तैयार हुई तो ग्राफीन बनाने में कई बार हीटिंग फ्लो अधिक हो जाता था, जिससे असफलता मिली। 
परीक्षण के दौरान प्रो. नंद गोपाल साहू निरीक्षण के लिए लैब पहुंचे तो ग्राफीन बनाने के दौरान भट्टी से आग की लपटें उठने लगी। इसके बाद उन्हें ग्राफीन बनाने की विधि में सफलता मिली। शोधार्थी सुनील ढाली ने कहा कि हीटिंग रेट कम किया गया और ग्राफीन बनाने में कामयाबी मिली। वर्ष 2019 में इसका प्रयोग सरोवर नगरी को प्लास्टिक से मुक्त कराने के लिए किया जा रहा है।


क्या है ग्राफीन
ग्राफीन कार्बन का ही एक फ ॉर्म है। यह एक पदार्थ है और इसकी मोटाई नहीं होती है। यह सिर्फ अणु की सपाट परत है। इसे दुनिया का सबसे मजबूत पदार्थ माना गया है। यह स्टील से 100 गुना ज्यादा मजबूत है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसका भार बहुत ही कम होता है। इसके एक वर्ग मीटर शीट का वजन 0.77 ग्राम होता है। यह मेटल बहुत सुचालक है। इसे शू्न्य प्रतिशत नुकसान के साथ ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। इसकी खोज आंद्रे जीम और कोंसटांटिन नोवोसेलोव ने की, जिसके लिए उन्हें वर्ष 2010 का भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
 

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