{"_id":"65188a3e2b81fca42b06e486","slug":"gandhi-ashram-doesnt-even-have-money-to-buy-cotton-haldwani-news-c-8-hld1005-236174-2023-10-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Nainital News: गांधी आश्रम के पास रूई खरीदने के भी पैसे नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Nainital News: गांधी आश्रम के पास रूई खरीदने के भी पैसे नहीं
विज्ञापन
अमित उप्रेती
हल्द्वानी। गांधी आश्रम घाटे में चल रहे हैं। कभी साल में औसतन 50 से 60 लाख रुपये की रूई खरीदने वाले तराई-भाबर के मुख्यालय हल्द्वानी के पास अब रूई खरीदने के भी पैसे नहीं हैं। कच्चा माल नहीं आ रहा है। इससे कतिन और बुनकरों को भी काम नहीं मिल पा रहा है। 2018-19 में 7.65 लाख की बिक्री 2022-23 में घटकर 6.44 लाख रह गई है। पिछले दो साल से खादी बोर्ड देहरादून से छूट का पैसा भी नहीं मिला है।
तराई-भाबर क्षेत्र का मुख्यालय हल्द्वानी में है। यहां बने गोदाम से ऊनी, सूती, रेशम गांधी आश्रमों को सप्लाई होता है। इसकी एक शाखा फतेहपुर में भी है जो उत्पादन केंद्र है। यहां शहद, तेल, साबुन का उत्पादन किया जाता है। दूसरा उत्पादन केंद्र काशीपुर में है। इस बार गांधी आश्रम के पास पैसे की तंगी होने से वह रूई भी नहीं खरीद पा रहा है।
रूई पंजाब और ऊन देहरादून से मंगानी पड़ती है। गांधी आश्रम कतिन और बुनकरों को रूई देता है और वह रूई कातकर सूत तैयार करते हैं। सूत उत्पादन केंद्रों को भेजे जाते हैं जहां विभिन्न प्रकार के कपड़े तैयार होते हैं। इसी कपड़े को बेचकर गांधी आश्रम अपनी आय अर्जित करता है। छह साल में बुनकरों की संख्या 1100 से घटकर 450 रह गई है। बुनकरों को प्रति किलो रूई कातने पर 150 रुपये मेहनताना दिया जाता है। अब गांधी आश्रम की बिक्री भी घट गई है।
विज्ञापन
......
दो साल से नहीं मिला क्लेम का पैसा
अक्तूबर से फरवरी तक गांधी आश्रम में ग्राहकों को सामान की खरीद पर 25 प्रतिशत छूट दी जाती है जिसकी पूर्ति के लिए गांधी आश्रम खादी बोर्ड देहरादून को क्लेम भेजता है। वर्ष 2021-22 और 2022-23 से गांधी आश्रम को क्लेम का करीब 96 लाख रुपया नहीं मिल पाया है।
..........
वर्ष बिक्री लाख में
2018-19- 7.65
2019-20- 7.22
2020-21-6.37
2021-22-6.54
2022-23- 6.44
-=-- -- -- -- -- -=-
कभी रोजगार का था प्रमुख साधन
एक समय कतिन (सूत कातने वाले) और बुनकरों का रोजगार का प्रमुख जरिया गांधी आश्रम ही होता था। गांधी आश्रम से रूई लेकर ये लोग बड़ी संख्या में सूत और कपड़ा तैयार करते थे। जज फार्म निवासी तारा मेर बताती हैं कि परिवार का खर्चा चलाने के लिए 1994 में उन्होंने तीन हजार रुपये में सूत कातने वाली मशीन खरीदी थी। एक माह में 40 किलो रुई कात लेती थीं। शुरुआत में 30 रुपये प्रति किलो मेहनताना मिलता था जो अब 150 रुपये तक हो गया है।
उन्होंने बताया कि कई साल से बीच-बीच में ही रुई आ पाती है। वह भी कम मात्रा में मिलने लगी है जिससे साल के कई महीने खाली रहना पड़ता है। 2016 में तो छह माह तक रुई नहीं मिली। जब सामान नहीं मिला तो उन्होंने यह काम छोड़ दिया। इस बीच लगातार बंद रहने से मशीन भी खराब हो गई थी। उनके साथ करीब 50 लोग जिनमें 30 महिलाएं और 20 पुरुष भी रुई कातने का काम करते थे। अब वे बाजार से ऊन खरीदकर स्वेटर बुनती हैं। सूत कातने वाली मशीन घर के एक कोने में पड़ी है।
वहीं हरिप्रिया पाठक बताती हैं कि 1997 में उन्हाेंने मशीन पर काम करना शुरू किया। तब एक किलो रूई 50 रुपये मे मिल जाती थी। बाद में गांधी आश्रम में रूई मिलने में दिक्कत होने लगी तो काम छोड़ दिया।
......
- कोट =-
बजट की कमी से रूई उपलब्ध होने में दिक्कत आ लगी है। कोविड के बाद से बिक्री घटी है और बुनकरों की संख्या भी कम हुई है। इधर दो साल से ग्राहकों को दी गई छूट का पैसा भी नहीं मिला है।
-अभय कुमार वर्मा, चीफ अकाउंटेंट, गांधी आश्रम मुख्यालय हल्द्वानी।
=-=-
खादी वस्त्रों पर कल से 25 फीसदी की छूट
हल्द्वानी। गांधी आश्रम मुख्यालय हल्द्वानी के चीफ अकाउंटेंट अभय कुमार वर्मा ने बताया कि गांधी जयंती के उपलक्ष्य में खादी वस्त्रों पर 25 फीसदी की छूट दी जाएगी। यह छूट दो अक्तूबर से 108 दिन तक जारी रहेगी।
विज्ञापन
हल्द्वानी। गांधी आश्रम घाटे में चल रहे हैं। कभी साल में औसतन 50 से 60 लाख रुपये की रूई खरीदने वाले तराई-भाबर के मुख्यालय हल्द्वानी के पास अब रूई खरीदने के भी पैसे नहीं हैं। कच्चा माल नहीं आ रहा है। इससे कतिन और बुनकरों को भी काम नहीं मिल पा रहा है। 2018-19 में 7.65 लाख की बिक्री 2022-23 में घटकर 6.44 लाख रह गई है। पिछले दो साल से खादी बोर्ड देहरादून से छूट का पैसा भी नहीं मिला है।
तराई-भाबर क्षेत्र का मुख्यालय हल्द्वानी में है। यहां बने गोदाम से ऊनी, सूती, रेशम गांधी आश्रमों को सप्लाई होता है। इसकी एक शाखा फतेहपुर में भी है जो उत्पादन केंद्र है। यहां शहद, तेल, साबुन का उत्पादन किया जाता है। दूसरा उत्पादन केंद्र काशीपुर में है। इस बार गांधी आश्रम के पास पैसे की तंगी होने से वह रूई भी नहीं खरीद पा रहा है।
विज्ञापन
रूई पंजाब और ऊन देहरादून से मंगानी पड़ती है। गांधी आश्रम कतिन और बुनकरों को रूई देता है और वह रूई कातकर सूत तैयार करते हैं। सूत उत्पादन केंद्रों को भेजे जाते हैं जहां विभिन्न प्रकार के कपड़े तैयार होते हैं। इसी कपड़े को बेचकर गांधी आश्रम अपनी आय अर्जित करता है। छह साल में बुनकरों की संख्या 1100 से घटकर 450 रह गई है। बुनकरों को प्रति किलो रूई कातने पर 150 रुपये मेहनताना दिया जाता है। अब गांधी आश्रम की बिक्री भी घट गई है।
विज्ञापन
......
दो साल से नहीं मिला क्लेम का पैसा
अक्तूबर से फरवरी तक गांधी आश्रम में ग्राहकों को सामान की खरीद पर 25 प्रतिशत छूट दी जाती है जिसकी पूर्ति के लिए गांधी आश्रम खादी बोर्ड देहरादून को क्लेम भेजता है। वर्ष 2021-22 और 2022-23 से गांधी आश्रम को क्लेम का करीब 96 लाख रुपया नहीं मिल पाया है।
..........
वर्ष बिक्री लाख में
2018-19- 7.65
2019-20- 7.22
2020-21-6.37
2021-22-6.54
2022-23- 6.44
-=
कभी रोजगार का था प्रमुख साधन
एक समय कतिन (सूत कातने वाले) और बुनकरों का रोजगार का प्रमुख जरिया गांधी आश्रम ही होता था। गांधी आश्रम से रूई लेकर ये लोग बड़ी संख्या में सूत और कपड़ा तैयार करते थे। जज फार्म निवासी तारा मेर बताती हैं कि परिवार का खर्चा चलाने के लिए 1994 में उन्होंने तीन हजार रुपये में सूत कातने वाली मशीन खरीदी थी। एक माह में 40 किलो रुई कात लेती थीं। शुरुआत में 30 रुपये प्रति किलो मेहनताना मिलता था जो अब 150 रुपये तक हो गया है।
उन्होंने बताया कि कई साल से बीच-बीच में ही रुई आ पाती है। वह भी कम मात्रा में मिलने लगी है जिससे साल के कई महीने खाली रहना पड़ता है। 2016 में तो छह माह तक रुई नहीं मिली। जब सामान नहीं मिला तो उन्होंने यह काम छोड़ दिया। इस बीच लगातार बंद रहने से मशीन भी खराब हो गई थी। उनके साथ करीब 50 लोग जिनमें 30 महिलाएं और 20 पुरुष भी रुई कातने का काम करते थे। अब वे बाजार से ऊन खरीदकर स्वेटर बुनती हैं। सूत कातने वाली मशीन घर के एक कोने में पड़ी है।
वहीं हरिप्रिया पाठक बताती हैं कि 1997 में उन्हाेंने मशीन पर काम करना शुरू किया। तब एक किलो रूई 50 रुपये मे मिल जाती थी। बाद में गांधी आश्रम में रूई मिलने में दिक्कत होने लगी तो काम छोड़ दिया।
......
- कोट =-
बजट की कमी से रूई उपलब्ध होने में दिक्कत आ लगी है। कोविड के बाद से बिक्री घटी है और बुनकरों की संख्या भी कम हुई है। इधर दो साल से ग्राहकों को दी गई छूट का पैसा भी नहीं मिला है।
-अभय कुमार वर्मा, चीफ अकाउंटेंट, गांधी आश्रम मुख्यालय हल्द्वानी।
=-=-
खादी वस्त्रों पर कल से 25 फीसदी की छूट
हल्द्वानी। गांधी आश्रम मुख्यालय हल्द्वानी के चीफ अकाउंटेंट अभय कुमार वर्मा ने बताया कि गांधी जयंती के उपलक्ष्य में खादी वस्त्रों पर 25 फीसदी की छूट दी जाएगी। यह छूट दो अक्तूबर से 108 दिन तक जारी रहेगी।