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शराब विरोधी आंदोलन, सुप्रीम कोर्ट
Updated Sat, 05 Aug 2017 02:08 AM IST
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हल्द्वानी। राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर प्रतिबंध पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से कुमाऊं के पर्वतीय जिलों में शराब विरोधी आंदोलन को झटका लगा है। मैदानी क्षेत्रों में इस आदेश के बाद भी सरकार को खास फायदा शायद ही मिल पाए।
राष्ट्रीय और राज्य मार्ग के रूप में अधिसूचित सड़कों के 500 मीटर के दायरे से शराब की दुकानों को बाहर करने के आदेश के बाद कुमाऊं आंदोलन की आंच में तप गया है। शुरू में राजमार्गों से इन दुकानों को शिफ्ट कर आबादी वाले क्षेत्रों में स्थापित करने का विरोध हुआ। धीरे-धीरे इस विरोध ने अवैध शराब के संचालन, शराब माफिया के खिलाफ भी जोर पकड़ा। अब इस आंदोलन की आंच में शराब का पूरा कारोबार भी झुलस रहा है। कुमाऊं वैसे भी शराब विरोधी आंदोलन के लिए उर्वर साबित होता आया है। द्वाराहाट में ही कई महिला मंगल दल एक मंच पर आकर शराब व्यवसाय का विरोध छेड़े हुए हैं। इस शराब विरोधी आंदोलन में हर जगह महिलाएं ही अग्रिम मोर्चे पर डटी हैं। राजस्व की चिंता में दुबली हो रही प्रदेश सरकार ने पर्वतीय प्रदेश के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय से राहत मांगी थी। अब सर्वोच्च न्यायालय से प्रदेश सरकार को तो कुछ हद तक राहत मिल गई है। कारण यह भी है कि मैदानी जिलों की तहसीलों के लिए न्यायालय ने कोई राहत नहीं दी है। यही वह क्षेत्र भी हैं जहां सरकार को आबकार से अधिक राजस्व भी मिलता है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सहारा पाकर मैदानी ऊधमसिंह नगर, नैनीताल जिले की कालाढ़ूंगी, लालकुआं, हल्द्वानी, रामनगर तहसील में शराब विरोधी आंदोलन और तेज हो सकता है। इन क्षेत्रों में शराब विरोधी आंदोलन में आपसी विवाद भी शामिल है। दूसरी ओर, कुमाऊं के पर्वतीय जिले ही हैं जहां से शराब विरोध की आवाज उठती रही है। यहां अधिकतर राजमार्ग आवासीय क्षेत्र और कस्बों के बीच से होकर गुजरते हैं। एक तरह से राजमार्गों से शराब की दुकानों को शिफ्ट कराने का मामला आवासीय क्षेत्रों से दुकानों और ठकों को हटाने का भी है। पर्वतीय क्षेत्रों में राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों केसंचालन की अनुमति मिलना आंदोलनकारियों को कतई रास नहीं आएगा। वहीं, सरकार को भी आबकारी से बहुत अधिक फायदा होने की उम्मीद कम ही है।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पर्वतीय जिलों के शराब विरोधी आंदोलन को झटका
मैदानी क्षेत्रों में भी सरकार को नहीं मिलेगा खास फायदा
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राष्ट्रीय और राज्य मार्ग के रूप में अधिसूचित सड़कों के 500 मीटर के दायरे से शराब की दुकानों को बाहर करने के आदेश के बाद कुमाऊं आंदोलन की आंच में तप गया है। शुरू में राजमार्गों से इन दुकानों को शिफ्ट कर आबादी वाले क्षेत्रों में स्थापित करने का विरोध हुआ। धीरे-धीरे इस विरोध ने अवैध शराब के संचालन, शराब माफिया के खिलाफ भी जोर पकड़ा। अब इस आंदोलन की आंच में शराब का पूरा कारोबार भी झुलस रहा है। कुमाऊं वैसे भी शराब विरोधी आंदोलन के लिए उर्वर साबित होता आया है। द्वाराहाट में ही कई महिला मंगल दल एक मंच पर आकर शराब व्यवसाय का विरोध छेड़े हुए हैं। इस शराब विरोधी आंदोलन में हर जगह महिलाएं ही अग्रिम मोर्चे पर डटी हैं। राजस्व की चिंता में दुबली हो रही प्रदेश सरकार ने पर्वतीय प्रदेश के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय से राहत मांगी थी। अब सर्वोच्च न्यायालय से प्रदेश सरकार को तो कुछ हद तक राहत मिल गई है। कारण यह भी है कि मैदानी जिलों की तहसीलों के लिए न्यायालय ने कोई राहत नहीं दी है। यही वह क्षेत्र भी हैं जहां सरकार को आबकार से अधिक राजस्व भी मिलता है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का सहारा पाकर मैदानी ऊधमसिंह नगर, नैनीताल जिले की कालाढ़ूंगी, लालकुआं, हल्द्वानी, रामनगर तहसील में शराब विरोधी आंदोलन और तेज हो सकता है। इन क्षेत्रों में शराब विरोधी आंदोलन में आपसी विवाद भी शामिल है। दूसरी ओर, कुमाऊं के पर्वतीय जिले ही हैं जहां से शराब विरोध की आवाज उठती रही है। यहां अधिकतर राजमार्ग आवासीय क्षेत्र और कस्बों के बीच से होकर गुजरते हैं। एक तरह से राजमार्गों से शराब की दुकानों को शिफ्ट कराने का मामला आवासीय क्षेत्रों से दुकानों और ठकों को हटाने का भी है। पर्वतीय क्षेत्रों में राजमार्ग के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों केसंचालन की अनुमति मिलना आंदोलनकारियों को कतई रास नहीं आएगा। वहीं, सरकार को भी आबकारी से बहुत अधिक फायदा होने की उम्मीद कम ही है।
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सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पर्वतीय जिलों के शराब विरोधी आंदोलन को झटका
मैदानी क्षेत्रों में भी सरकार को नहीं मिलेगा खास फायदा