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उत्तराखंड: विधायक महेश नेगी की याचिका पर सुनवाई से हाईकोर्ट का इनकार

Thu, 14 Jan 2021 10:05 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: हल्द्वानी ब्यूरो Updated Thu, 14 Jan 2021 10:05 AM IST
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Uttarakhand Mla Mahesh negi Sexual assault Case: High Court refuses to hear MLA Mahesh Negi plea
- फोटो : फाइल फोटो

डीएनए सैंपलिंग के लिए कोर्ट में उपस्थित होने के सीजेएम कोर्ट देहरादून के आदेश को चुनौती देने वाली द्वाराहाट विधायक महेश नेगी की याचिका को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुनने से इनकार कर दिया है। अब मुख्य न्यायाधीश मामले को सुनवाई के लिए नई बेंच को भेजेंगे। पूर्व में एकलपीठ ने सीजेएम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार और अन्य को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे। 

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न्यायमूर्ति एनएस धानिक की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।  विधायक महेश सिंह नेगी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर डीएनए सैंपलिंग के लिए सीजेएम कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश को चुनौती देते हुए उस पर रोक लगाने की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने 13 जनवरी तक सीजेएम कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार और अन्य को जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। 13 जनवरी को हुई सुनवाई में एकलपीठ ने मामले में सुनवाई करने से इनकार कर दिया। 
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सीजेएम कोर्ट ने विधायक और उन पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली महिला की बेटी को डीएनए सैंपलिंग के लिए कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश दिए थे, महेश नेगी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। महिला का आरोप है महेश नेगी ही उससे पैदा हुई बेटी के जैविक पिता हैं।
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ये है मामला
विधायक महेश नेगी के खिलाफ एक महिला ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। इस मामले में पुलिस ने पीड़िता की ओर से मुकदमा दर्ज नहीं किया था। ऐसे में पीड़िता ने कोर्ट में शिकायत की। इसके बाद नेहरू कॉलोनी में विधायक महेश नेगी व उनकी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था।

पीड़िता का आरोप है कि विधायक ने देश के कई शहरों में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया है। इससे उनकी एक बेटी भी पैदा हुई है। पीड़िता का दावा है कि उसने बेटी का डीएनए टेस्ट कराया था, जिसमें महेश नेगी ही उसके जैविक पिता होने की पुष्टि हुई थी। 


हालांकि, यह डीएनए रिपोर्ट पुलिस को नहीं मिली थी। पीड़िता के वकील एडवोकेट एसपी सिंह ने बताया कि उन्होंने विधायक के डीएनए टेस्ट कराने के लिए सीजेएम कोर्ट में प्रार्थनापत्र दिया था। इस मामले में सुनवाई करते हुए सीजेएम कोर्ट ने आदेश पारित किए थे।

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