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प्रदेश के वन गुर्जरों के संरक्षण तथा विस्थापन करने के मामले पर सुनवाई दो को
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नैनीताल। प्रदेश में वन गुर्जरों के रहन-सहन की सही जानकारी इकट्ठा करने और उनकी समस्याओं का पता लगाने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर कमेटी पुनर्गठित कर दी है। सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में यह जानकारी दी गई है। वन गुर्जरों के संरक्षण तथा विस्थापन करने के मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद अदालत ने अगली सुनवाई के लिए दो मार्च की तिथि नियत की है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष एनजीओ थिंक एक्ट राइजिंग फाउंडेशन तथा हिमालयन युवा ग्रामीण और अन्य की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इससे पूर्व की सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सरकार ने वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए जो कमेटी गठित की थी, उसकी रिपोर्ट पर सरकार अमल नहीं कर रही है। कोर्ट ने वन गुर्जरों को दस लाख का मुआवजा देने को कहा था लेकिन सरकार ने आधे परिवारों को दिया और आधे को नहीं। सरकार ने वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए जो नियमावली बनाई, वह भ्रमित करने वाली है। मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था तक नहीं की गई है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ की ओर से कोर्ट को बताया था कि उन्होंने अधिकतर परिवारों को मुआवजा दे दिया है।
विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। शीघ्र ही इन लोगों को मालिकाना हक संबंधी प्रमाण पत्र जारी किए जाएंगे। याचिका में ये भी कहा गया कि सरकार वन गुर्जरों को उनके परंपरागत हक हुकूकों से वंचित कर रही है। 150 सालों से वनों में रह रहे गुर्जरों को हटाया जा रहा है। उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। इसलिए उनको सभी अधिकार देकर विस्थापित किया जाए।
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याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा कि पूर्व में कोर्ट ने कोर्बेट पार्क के सोना नदी क्षेत्र में छूटे हुए 24 वन गुर्जरों के परिवारों को 10 लाख रुपये तीन माह के भीतर देने, इनको छह माह के भीतर भूमि देने, सभी परिवारों को जमीन के मालिकाना हक संबंधी प्रमाण पत्र छह माह के भीतर देने, राजाजी नेशनल पार्क में वन गुर्जरों के उजड़े हुए परिवारों को जीवन यापन के लिए सभी जरूरी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने व वहां के वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे लेकिन सरकार ने इन आदेशों का पालन नहीं किया। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए थे कि वन गुर्जरों के मामले में कमेटी का पुनर्गठन कर अन्य सक्षम अधिकारियों को इस कमेटी में शामिल करें जिन्हें वन गुर्जरों के रहन-सहन आदि की जानकारी हो।
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष एनजीओ थिंक एक्ट राइजिंग फाउंडेशन तथा हिमालयन युवा ग्रामीण और अन्य की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इससे पूर्व की सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सरकार ने वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए जो कमेटी गठित की थी, उसकी रिपोर्ट पर सरकार अमल नहीं कर रही है। कोर्ट ने वन गुर्जरों को दस लाख का मुआवजा देने को कहा था लेकिन सरकार ने आधे परिवारों को दिया और आधे को नहीं। सरकार ने वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए जो नियमावली बनाई, वह भ्रमित करने वाली है। मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था तक नहीं की गई है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ की ओर से कोर्ट को बताया था कि उन्होंने अधिकतर परिवारों को मुआवजा दे दिया है।
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विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। शीघ्र ही इन लोगों को मालिकाना हक संबंधी प्रमाण पत्र जारी किए जाएंगे। याचिका में ये भी कहा गया कि सरकार वन गुर्जरों को उनके परंपरागत हक हुकूकों से वंचित कर रही है। 150 सालों से वनों में रह रहे गुर्जरों को हटाया जा रहा है। उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। इसलिए उनको सभी अधिकार देकर विस्थापित किया जाए।
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याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा कि पूर्व में कोर्ट ने कोर्बेट पार्क के सोना नदी क्षेत्र में छूटे हुए 24 वन गुर्जरों के परिवारों को 10 लाख रुपये तीन माह के भीतर देने, इनको छह माह के भीतर भूमि देने, सभी परिवारों को जमीन के मालिकाना हक संबंधी प्रमाण पत्र छह माह के भीतर देने, राजाजी नेशनल पार्क में वन गुर्जरों के उजड़े हुए परिवारों को जीवन यापन के लिए सभी जरूरी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने व वहां के वन गुर्जरों के विस्थापन के लिए सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे लेकिन सरकार ने इन आदेशों का पालन नहीं किया। हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए थे कि वन गुर्जरों के मामले में कमेटी का पुनर्गठन कर अन्य सक्षम अधिकारियों को इस कमेटी में शामिल करें जिन्हें वन गुर्जरों के रहन-सहन आदि की जानकारी हो।