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Nainital News: मौसम की मार से रूठा सेब, अब कीवी, ड्रैगन फ्रूट से आय में मिठास की उम्मीद
Sun, 24 May 2026 12:51 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Sun, 24 May 2026 12:51 AM IST
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नैनीताल। उत्तराखंड सहित पूरे पर्वतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर कृषि और बागवानी पर दिख रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और सूखे के कारण किसानों की पारंपरिक खेती प्रभावित हो रही है। कम चिलिंग के कारण फलों की पैदावार घट रही है।
कृषि विज्ञान केंद्र ज्योलीकोट की उद्यान वैज्ञानिक डॉ. दीपाली तिवारी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून के आगमन और वर्षा वितरण में बड़ा बदलाव आया है जिससे फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक सेब उत्पादन पर भी जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दिखाई दे रहा है। पहले जिन क्षेत्रों में रेड डिलीशियस, रॉयल डिलीशियस एवं गोल्डन डिलीशियस जैसी पारंपरिक सेब की किस्में अच्छी पैदावार देती थीं, वहां अब कम चिलिंग के कारण उत्पादन घट रहा है। इसके चलते किसान अन्ना, डॉर्सेट गोल्डन, ट्रॉपिकल ब्यूटी और एचआरएमएन-99 जैसी कम चिलिंग वाली सेब की किस्में अपना रहे हैं। कई क्षेत्रों में सेब के स्थान पर माल्टा, नींबू, किन्नू, कीवी, ड्रैगन फ्रूट, अमरूद एवं अनार का रकबा बढ़ रहा है।
जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन पर हो रहा कार्य
कृषि वैज्ञानिक नमी संरक्षण तकनीकों जैसे मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार (एनआईसीआरए) परियोजना के तहत चंपावत, उत्तरकाशी और टिहरी में जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन पर कार्य हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान आईसीआरआईसैट भी जलवायु स्मार्ट कृषि को बढ़ावा दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पारंपरिक मोटे अनाज एवं दलहनी फसलें फिर से महत्वपूर्ण बन रही हैं। मंडुवा (रागी), झंगोरा, मसूर, कुल्थ एवं अन्य पारंपरिक फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं। एकीकृत कृषि प्रणाली भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है। इसमें फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन और जल संरक्षण को एक साथ जोड़ा जाता है।
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कृषि के लिए लाभकारी नौतपा
विशेषज्ञों ने बताया कि नौतपा की अवधि का वैज्ञानिक उपयोग भी कृषि के लिए लाभकारी हो सकता है। इस दौरान अधिक तापमान से भूमि का प्राकृतिक शोधन होता है और कई हानिकारक कीट कम हो जाते हैं। किसान इस अवधि का उपयोग खेत तैयारी, नर्सरी प्रबंधन एवं जल संरक्षण संरचनाओं की मरम्मत के लिए कर सकते हैं।
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कृषि विज्ञान केंद्र ज्योलीकोट की उद्यान वैज्ञानिक डॉ. दीपाली तिवारी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून के आगमन और वर्षा वितरण में बड़ा बदलाव आया है जिससे फसलों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित हो रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक सेब उत्पादन पर भी जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दिखाई दे रहा है। पहले जिन क्षेत्रों में रेड डिलीशियस, रॉयल डिलीशियस एवं गोल्डन डिलीशियस जैसी पारंपरिक सेब की किस्में अच्छी पैदावार देती थीं, वहां अब कम चिलिंग के कारण उत्पादन घट रहा है। इसके चलते किसान अन्ना, डॉर्सेट गोल्डन, ट्रॉपिकल ब्यूटी और एचआरएमएन-99 जैसी कम चिलिंग वाली सेब की किस्में अपना रहे हैं। कई क्षेत्रों में सेब के स्थान पर माल्टा, नींबू, किन्नू, कीवी, ड्रैगन फ्रूट, अमरूद एवं अनार का रकबा बढ़ रहा है।
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जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन पर हो रहा कार्य
कृषि वैज्ञानिक नमी संरक्षण तकनीकों जैसे मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार (एनआईसीआरए) परियोजना के तहत चंपावत, उत्तरकाशी और टिहरी में जल संरक्षण और सूखा प्रबंधन पर कार्य हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान आईसीआरआईसैट भी जलवायु स्मार्ट कृषि को बढ़ावा दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पारंपरिक मोटे अनाज एवं दलहनी फसलें फिर से महत्वपूर्ण बन रही हैं। मंडुवा (रागी), झंगोरा, मसूर, कुल्थ एवं अन्य पारंपरिक फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं। एकीकृत कृषि प्रणाली भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है। इसमें फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन और जल संरक्षण को एक साथ जोड़ा जाता है।
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कृषि के लिए लाभकारी नौतपा
विशेषज्ञों ने बताया कि नौतपा की अवधि का वैज्ञानिक उपयोग भी कृषि के लिए लाभकारी हो सकता है। इस दौरान अधिक तापमान से भूमि का प्राकृतिक शोधन होता है और कई हानिकारक कीट कम हो जाते हैं। किसान इस अवधि का उपयोग खेत तैयारी, नर्सरी प्रबंधन एवं जल संरक्षण संरचनाओं की मरम्मत के लिए कर सकते हैं।