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मोमबत्ती, पिछौड़ा, लीची को मिलेगा जीआई टैग
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लीची।
- फोटो : NAINITAL
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नैनीताल। जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत शिल्प कला को बढ़ावा देने के साथ ही अब प्रशासन ने पहाड़ के पारंपरिक उत्पाद और संस्कृति से जुड़ी सामग्रियों को भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) दिलाने की पहल शुरू की है। पहले चरण में नैनीताल में बनने वाली फैंसी मोमबत्ती और पारंपरिक पिछौड़े को जीआई टैग दिलाने के लिए चेन्नई की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में आवेदन किया गया है। इसके बाद रामनगर की लीची और रामगढ़ के आडू के लिए यह पहल की जाएगी।
नैनीताल में बनने वाली मोमबत्तियां देशभर में प्रसिद्ध हैं। पिछौड़ा कुमाऊं की संस्कृति में खास स्थान रखता है। जब से बाजार में चीन निर्मित सामग्री बिक्री के लिए आई है तब से नैनीताल में फैंसी मोमबत्ती निर्माण का कार्य भी लगातार घट रहा है। इसे देखते हुए डीएम धीराज सिंह गर्ब्याल ने सीडीओ डॉ. संदीप तिवारी को जिले के उन सभी उत्पादों को सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए। पहले चरण में जिला प्रशासन ने फैंसी मोमबत्ती और पिछौड़ा के प्रपत्र चेन्नई स्थित रजिस्ट्री कार्यालय में जमा किए हैं जबकि लीची और आढ़ू के लिए औपचारिकताएं भी मई के पहले सप्ताह तक पूरी कर ली जाएंगी। जिला प्रशासन को उम्मीद है कि इन चारों उत्पादों को अक्तूबर तक जीआई टैग मिल जाएगा और इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान में मदद मिलेगी जिसका लाभ स्थानीय लोगों को भी मिलेगा।
क्या है भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग
नैनीताल। भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग किसी विशेष क्षेत्र से संबंधित उत्पाद को दिया जाता है। यह उस विशेष उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और किसी भी अन्य विशेषताओं को आम तौर पर उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।
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तेजपत्ते को मिला है जीआई टैग
नैनीताल। उत्तराखंड में कृषि के क्षेत्र में अभी तक केवल तेजपत्ते को ही जीआई टैग मिला हुआ है। इससे उत्तराखंड मे पैदा होने वाले तेजपत्ते की पहचान और राष्ट्रीय स्तर पर है।
जीआई टैग के लाभ
नैनीताल। विशेषज्ञों के मुताबिक जीआई टैग मिलने के बाद उत्पादों की नकल को रोका जा सकता है। किसी उत्पाद को भौगोलिक संकेत मिलने के बाद उसे कानूनी संरक्षण भी प्राप्त होता है। यह टैग अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों को ही दिया जाता है ताकि ग्राहकों की संतुष्टि बढ़े।
पद्मश्री सौरभ श्रीवास्तव ने दी पांच लाख की सहयोग राशि
नैनीताल। चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में किसी भी उत्पाद को जीआई टैग दिलाने में लगभग ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। डीएम धीराज सिंह गर्ब्याल ने बताया कि चार उत्पादों को जीआई टैग दिलाने के लिए दस लाख रुपये की जरूरत थी। फैंसी मोमबत्ती और पिछौड़े के लिए पांच लाख रुपये उद्यान विभाग से दिलाए गए जबकि लीची और आड़ू के लिए पांच लाख रुपये रामगढ़ निवासी पद्मश्री सौरभ श्रीवास्तव ने अपनी ओर से प्रशासन को दिए हैं। डीएम ने कहा कि इन चारों उत्पादों को जीआई टैग मिलने के बाद इनका संरक्षण और संवर्धन होगा।
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नैनीताल। जिले के पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत शिल्प कला को बढ़ावा देने के साथ ही अब प्रशासन ने पहाड़ के पारंपरिक उत्पाद और संस्कृति से जुड़ी सामग्रियों को भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) दिलाने की पहल शुरू की है। पहले चरण में नैनीताल में बनने वाली फैंसी मोमबत्ती और पारंपरिक पिछौड़े को जीआई टैग दिलाने के लिए चेन्नई की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में आवेदन किया गया है। इसके बाद रामनगर की लीची और रामगढ़ के आडू के लिए यह पहल की जाएगी।
नैनीताल में बनने वाली मोमबत्तियां देशभर में प्रसिद्ध हैं। पिछौड़ा कुमाऊं की संस्कृति में खास स्थान रखता है। जब से बाजार में चीन निर्मित सामग्री बिक्री के लिए आई है तब से नैनीताल में फैंसी मोमबत्ती निर्माण का कार्य भी लगातार घट रहा है। इसे देखते हुए डीएम धीराज सिंह गर्ब्याल ने सीडीओ डॉ. संदीप तिवारी को जिले के उन सभी उत्पादों को सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए। पहले चरण में जिला प्रशासन ने फैंसी मोमबत्ती और पिछौड़ा के प्रपत्र चेन्नई स्थित रजिस्ट्री कार्यालय में जमा किए हैं जबकि लीची और आढ़ू के लिए औपचारिकताएं भी मई के पहले सप्ताह तक पूरी कर ली जाएंगी। जिला प्रशासन को उम्मीद है कि इन चारों उत्पादों को अक्तूबर तक जीआई टैग मिल जाएगा और इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान में मदद मिलेगी जिसका लाभ स्थानीय लोगों को भी मिलेगा।
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क्या है भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग
नैनीताल। भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग किसी विशेष क्षेत्र से संबंधित उत्पाद को दिया जाता है। यह उस विशेष उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और किसी भी अन्य विशेषताओं को आम तौर पर उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।
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तेजपत्ते को मिला है जीआई टैग
नैनीताल। उत्तराखंड में कृषि के क्षेत्र में अभी तक केवल तेजपत्ते को ही जीआई टैग मिला हुआ है। इससे उत्तराखंड मे पैदा होने वाले तेजपत्ते की पहचान और राष्ट्रीय स्तर पर है।
जीआई टैग के लाभ
नैनीताल। विशेषज्ञों के मुताबिक जीआई टैग मिलने के बाद उत्पादों की नकल को रोका जा सकता है। किसी उत्पाद को भौगोलिक संकेत मिलने के बाद उसे कानूनी संरक्षण भी प्राप्त होता है। यह टैग अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों को ही दिया जाता है ताकि ग्राहकों की संतुष्टि बढ़े।
पद्मश्री सौरभ श्रीवास्तव ने दी पांच लाख की सहयोग राशि
नैनीताल। चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में किसी भी उत्पाद को जीआई टैग दिलाने में लगभग ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं। डीएम धीराज सिंह गर्ब्याल ने बताया कि चार उत्पादों को जीआई टैग दिलाने के लिए दस लाख रुपये की जरूरत थी। फैंसी मोमबत्ती और पिछौड़े के लिए पांच लाख रुपये उद्यान विभाग से दिलाए गए जबकि लीची और आड़ू के लिए पांच लाख रुपये रामगढ़ निवासी पद्मश्री सौरभ श्रीवास्तव ने अपनी ओर से प्रशासन को दिए हैं। डीएम ने कहा कि इन चारों उत्पादों को जीआई टैग मिलने के बाद इनका संरक्षण और संवर्धन होगा।

रंगबाई पिछौड़ा- फोटो : NAINITAL