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एचएमटी में बनेगा वन महकमे का भव्य संग्रहालय
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प्रतीकात्मक।
हल्द्वानी। वन विभाग अपने इतिहास और विरासत की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए भव्य संग्रहालय बनाने की तैयारी कर रहा है। इस संग्रहालय को एचएमटी से वापस मिली वन भूमि पर बनाया जाएगा।
कुमाऊं से वन विभाग का गहरा नाता रहा है। इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले कुमाऊं में स्थानीय स्तर पर लाठ पंचायत की व्यवस्था थी। 1815 में अंग्रेज कुमाऊं पहुंचे। 1818 में दूसरे कुमाऊं कमिश्नर जीडब्ल्यू ट्रेल ने पहली बार थापला में लगे साल के पेड़ों को संरक्षित करने के लिए प्रबंधन की व्यवस्था की। 1860 में कंजरवेटर का पद सृजित किया गया, जिसकी जिम्मेदारी सातवें कमिश्नर हेनरी रैमेजे को दी गई। हेनरी रैमेज ने वन प्रबंधन पर जोर दिया था। वर्किंग प्लान जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया। कुमाऊं कमिश्नरी में 1868 में वन विभाग की स्थापना हुई। बाद के समय में अंग्रेजों ने लकड़ी ढुलान के लिए अपनी खुद की ट्रेन तक चलवाई थी। वन विभाग से जुड़ी ऐसी तमाम जानकारियों और धरोहरों से लोगों को रूबरू कराने के लिए जंगलात अपना संग्रहालय बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
13 हेक्टेयर मिली है जमीन
संग्रहालय के लिए वन विभाग को मिली 13 हेक्टेयर वन भूमि मिली है। एचएमटी के पास नदी औक पहाड़ के किनारे की लोकेशन संग्रहालय के लिए मुफीद मानी जा रही है। नैनीताल रोड के करीब होने से नैनीताल जाने वाले पर्यटक भी इस संग्रहालय का दीदार कर सकेंगे।
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इतिहास के बारे में जान सकेंगे
प्रमुख वन संरक्षक राजीव भरतरी कहते हैं कि संग्रहालय के लिए एचएमटी बेहतर जगह है। संग्रहालय में वन विभाग के डेढ़ सौ साल के इतिहास, वन पंचायत आदि के बारे में जानकारी देने की योजना है। महकमें से जुड़ी धरोहरों को भी यहां प्रदर्शित किया जाएगा। शासन भी संग्रहालय निर्माण की योजना को लेकर सहमत है। मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्विनी पाटिल का कहना है कि संग्रहालय बनाने के लिए विस्तृत प्लान बनाकर जल्द वन मुख्यालय को भेज दिया जाएगा।
अभी एफटीआई में रखा है इंजन
हल्द्वानी। अभी वन विभाग से जुड़ी कुछ धरोहरें फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी में प्रदर्शित हैं। इसमें नंधौर ट्राम वे का इंजन भी है। हाल में तिकोनिया वन परिसर स्थित गैराज में वन संरक्षक की मर्सिडीज कैंप लारी वाहन भी मिला है। बूम रेंज कार्यालय में भी पुरानी धरोहरों के अवशेष हैं।
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कुमाऊं से वन विभाग का गहरा नाता रहा है। इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि अंग्रेजों के आने से पहले कुमाऊं में स्थानीय स्तर पर लाठ पंचायत की व्यवस्था थी। 1815 में अंग्रेज कुमाऊं पहुंचे। 1818 में दूसरे कुमाऊं कमिश्नर जीडब्ल्यू ट्रेल ने पहली बार थापला में लगे साल के पेड़ों को संरक्षित करने के लिए प्रबंधन की व्यवस्था की। 1860 में कंजरवेटर का पद सृजित किया गया, जिसकी जिम्मेदारी सातवें कमिश्नर हेनरी रैमेजे को दी गई। हेनरी रैमेज ने वन प्रबंधन पर जोर दिया था। वर्किंग प्लान जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया। कुमाऊं कमिश्नरी में 1868 में वन विभाग की स्थापना हुई। बाद के समय में अंग्रेजों ने लकड़ी ढुलान के लिए अपनी खुद की ट्रेन तक चलवाई थी। वन विभाग से जुड़ी ऐसी तमाम जानकारियों और धरोहरों से लोगों को रूबरू कराने के लिए जंगलात अपना संग्रहालय बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
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13 हेक्टेयर मिली है जमीन
संग्रहालय के लिए वन विभाग को मिली 13 हेक्टेयर वन भूमि मिली है। एचएमटी के पास नदी औक पहाड़ के किनारे की लोकेशन संग्रहालय के लिए मुफीद मानी जा रही है। नैनीताल रोड के करीब होने से नैनीताल जाने वाले पर्यटक भी इस संग्रहालय का दीदार कर सकेंगे।
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इतिहास के बारे में जान सकेंगे
प्रमुख वन संरक्षक राजीव भरतरी कहते हैं कि संग्रहालय के लिए एचएमटी बेहतर जगह है। संग्रहालय में वन विभाग के डेढ़ सौ साल के इतिहास, वन पंचायत आदि के बारे में जानकारी देने की योजना है। महकमें से जुड़ी धरोहरों को भी यहां प्रदर्शित किया जाएगा। शासन भी संग्रहालय निर्माण की योजना को लेकर सहमत है। मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्विनी पाटिल का कहना है कि संग्रहालय बनाने के लिए विस्तृत प्लान बनाकर जल्द वन मुख्यालय को भेज दिया जाएगा।
अभी एफटीआई में रखा है इंजन
हल्द्वानी। अभी वन विभाग से जुड़ी कुछ धरोहरें फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी में प्रदर्शित हैं। इसमें नंधौर ट्राम वे का इंजन भी है। हाल में तिकोनिया वन परिसर स्थित गैराज में वन संरक्षक की मर्सिडीज कैंप लारी वाहन भी मिला है। बूम रेंज कार्यालय में भी पुरानी धरोहरों के अवशेष हैं।