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52 साल बाद ही लुटने लगी पंत जी की विरासत
Nainital
Updated Thu, 12 Sep 2013 05:38 AM IST
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हल्द्वानी। कल ही हमने भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत की जयंती मनाई है। मंगलवार को भी पंत जी के आदर्शों पर चलने के संकल्प के अलावा उनकी विरासत पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। पंत जी के नाम से जुड़े एशिया के पहले कृषि विश्वविद्यालय का दायरा जहां राज्य बनने के बाद बढ़ना चाहिए था वह घट गया। लेकिन बैठकों में इसका जिक्र नहीं हुआ कि अपनी सरकारों ने विश्वविद्यालय की हजारों एकड़ जमीन लुटा दी है। हालांकि इसके पीछे बहाना विकास था, जबकि ऐसा था नहीं। वहां की धरती को भी किसी की मदद की जरूरत नहीं। जरूरत थी पंत जी का छोड़ा काम करने की। पहाड़ों की हालत सुधारने की।
पंतनगर विश्वविद्यालय केवल उत्तराखंड की पहचान का सवाल नहीं है। कृषि प्रधान देश भारत की जरूरत भी है। अपना राज्य बनने के बाद इस जरूरत की जमीन खिसकती गई। करीब नौ हजार एकड़ पर फैले विवि के पास आज अपनी जमीन के नाम पर केवल 5930.223 एकड़ ही भूमि रह गई है, जबकि पंत जी को गए अभी 52 साल ही हुए हैं। यह केवल 3478.3549 एकड़ जमीन का मामला नहीं है। इस जमीन से भविष्य जुड़ा है हजारों छात्रों का, लाखों किसानों का। यहां जमीन पर हुए शोधों के दम पर ही देश में हरित क्रांति भी हुई। आज भी विवि के पास जो जमीन बची है वह शोधों कार्यों के काम आने के साथ ही अरबों रुपये कमा रही है।
आरटीआई कार्यकर्ता गुरविंदर चड्ढा को सूचना अधिकार में मिली जानकारी से पता चला है कि सबसे अधिक 3291.6349 जमीन सिडकुल को दी गई, जबकि इस उपजाऊ जमीन के अलावा हमारे पास उद्योग लगाने को कई और जगहें भी थीं। इसके अलावा सिडकुल के साथ तय शर्तों पर भी किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। स्थानीय युवाओं को 70 फीसदी रोजगार कागजों में ही मिला। सिडकुल के अलावा 134.38 एकड़ भूमि विमान पत्तन विभाग, 2.34 एकड़ भूमि पुलिस और 50 एकड़ मंडी समिति को दी गई। बंजर जमीनें छोड़कर सोना उगलने वाली यह जमीन क्यों बांटी गई। इतने बड़े विश्वविद्यालय से क्यों खिलवाड़ हुआ, इसका जवाब आरटीआई से भी नहीं मिल सकता।
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पंतनगर विश्वविद्यालय केवल उत्तराखंड की पहचान का सवाल नहीं है। कृषि प्रधान देश भारत की जरूरत भी है। अपना राज्य बनने के बाद इस जरूरत की जमीन खिसकती गई। करीब नौ हजार एकड़ पर फैले विवि के पास आज अपनी जमीन के नाम पर केवल 5930.223 एकड़ ही भूमि रह गई है, जबकि पंत जी को गए अभी 52 साल ही हुए हैं। यह केवल 3478.3549 एकड़ जमीन का मामला नहीं है। इस जमीन से भविष्य जुड़ा है हजारों छात्रों का, लाखों किसानों का। यहां जमीन पर हुए शोधों के दम पर ही देश में हरित क्रांति भी हुई। आज भी विवि के पास जो जमीन बची है वह शोधों कार्यों के काम आने के साथ ही अरबों रुपये कमा रही है।
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आरटीआई कार्यकर्ता गुरविंदर चड्ढा को सूचना अधिकार में मिली जानकारी से पता चला है कि सबसे अधिक 3291.6349 जमीन सिडकुल को दी गई, जबकि इस उपजाऊ जमीन के अलावा हमारे पास उद्योग लगाने को कई और जगहें भी थीं। इसके अलावा सिडकुल के साथ तय शर्तों पर भी किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। स्थानीय युवाओं को 70 फीसदी रोजगार कागजों में ही मिला। सिडकुल के अलावा 134.38 एकड़ भूमि विमान पत्तन विभाग, 2.34 एकड़ भूमि पुलिस और 50 एकड़ मंडी समिति को दी गई। बंजर जमीनें छोड़कर सोना उगलने वाली यह जमीन क्यों बांटी गई। इतने बड़े विश्वविद्यालय से क्यों खिलवाड़ हुआ, इसका जवाब आरटीआई से भी नहीं मिल सकता।
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