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स्कूल की दीवारों में दौड़ती मौत, बेखबर प्रशासन
Nainital
Updated Sun, 21 Jul 2013 05:33 AM IST
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रामनगर। सीलन भरी दीवारें और बाहर शैवाल (काई) की मोटी परत। कमरों में भीतर से गुजर रही कटी बिजली की लाइनों से दीवारों में करंट दौड़ आता है। प्रदेश को टॉपर छात्र देने वाले लगभग खंडहर में तब्दील इस स्कूल में हर रोज बेहतर भविष्य की उम्मीदें लेकर 750 मासूम आते हैं। रामनगर में शिक्षा के इस मंदिर में आने वाले सैकड़ों मासूमों की जिंदगी से हो रहे खिलवाड़ की न तो उत्तराखंड के शिक्षा विभाग न जिला प्रशासन और न ही जनप्रतिनिधियों ने सुध ली है। हद तो इस बात की है जीआईसी रामनगर का यह जर्जर व जान जोखिम डालने वाला स्कूल उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद दफ्तर के ठीक सामने है।
1985 में जीआईसी का दर्जा प्राप्त इस विद्यालय के 6 से 11वीं कक्षा के बच्चों ने आज तक कुर्सी-मेज नहीं देखी। बारिश में यहां की छतें टपकती हैं बच्चों को मजबूरन गीली दरियों में बैठना पड़ता है। ये स्कूल 1979 में राजकीय दीक्षा विद्यालय (नार्मल) के रूप में अस्तित्व में आया था और उसके ठीक छह वर्ष बाद इसे उच्चीकृत किया गया, लेकिन तकदीर नहीं बदली। उत्तराखंड बोर्ड कार्यालय के सामने 750 बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाने वाले खुद आंखें बंद कर बैठ शायद किसी बड़े हादसे के इंतजार में हैं। 1979 में विद्यालय का भवन और छात्रावास बने थे। इनमें से किसी की मरम्मत नहीं की गई तो खंडहर होती इमारत को काई ने भी घेरना शुरू कर दिया।
कमरों की खिड़कियां, रोशनदान गायब हो चुके हैं। दरवाजों की चौखटों पर दीमक ने घर बना रखा है। यही नहीं जगह कम पड़ने की वजह से किसी-किसी कक्षा में 80 बच्चे बैठाए गए हैं। रसायन विज्ञान प्रयोगशाला ऐसी है जैसे नगरपालिका का शौचालय। दीवारों में करंट दौड़ने की वजह से कोई इनसे सटकर नहीं बैठता। बच्चों पर कब कौन सी बड़ी विपदा आ जाए कहा नहीं जा सकता लेकिन जिन्हें चिंता करनी चाहिए वही तमाशबीन बने बैठे हैं। प्रधानाचार्य अशोक कुमार मिश्रा का कहना है कि इंटर का दर्जा मिलने के बाद नया भवन नहीं बना और रमसा के सर्वेक्षण में विद्यालय के भवनविहीन होने की बात शिक्षा अधिकारियों के संज्ञान में लाई गई है। विद्यालय प्रबंधंन समिति ने भी क्षेत्रीय विधायक अमृता रावत से विद्यालय के वर्तमान भवन की मरम्मत करवाकर चार नए कक्षों बनाने की मांग की है।
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प्रधानाचार्य अशोक कुमार मिश्रा का कहना है कि बिजली की लाइनें कई जगह कटी हैं। विद्यालय स्तर से इनकी तीन बार मरम्मत कराई जा चुकी है, मगर बरसात के मौसम में दीवारों पर सीलन फैलने की वजह से कटी लाइनों का करंट दीवारों में आने लगता है। पिछली बरसातों में भी इस तरह की समस्या आई है। उनका कहना है कि दीवार का जितना हिस्सा सीलन से घिरा है उसी हिस्से में करंट का प्रभाव है। रिपेयरिंग करा दी है। बरसात के समय दीवारों में करंट आ जाता है।
टॉपर दिया था स्कूल ने
जीआईसी रामनगर उन विद्यालयों में है जिसने 2012 की बोर्ड परीक्षा में राज्य को मेरिट का टॉपर दिया था। इस हालत के बावजूद छात्र समीर रियाज ने 10वीं में राज्य में पहला स्थान आया था, मगर टॉपर देने वाले विद्यालय की बदहाली और जगह की कमी के चलते अब यहां नए छात्रों को भी प्रवेश मिलना मुश्किल हो रहा है।
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1985 में जीआईसी का दर्जा प्राप्त इस विद्यालय के 6 से 11वीं कक्षा के बच्चों ने आज तक कुर्सी-मेज नहीं देखी। बारिश में यहां की छतें टपकती हैं बच्चों को मजबूरन गीली दरियों में बैठना पड़ता है। ये स्कूल 1979 में राजकीय दीक्षा विद्यालय (नार्मल) के रूप में अस्तित्व में आया था और उसके ठीक छह वर्ष बाद इसे उच्चीकृत किया गया, लेकिन तकदीर नहीं बदली। उत्तराखंड बोर्ड कार्यालय के सामने 750 बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगाने वाले खुद आंखें बंद कर बैठ शायद किसी बड़े हादसे के इंतजार में हैं। 1979 में विद्यालय का भवन और छात्रावास बने थे। इनमें से किसी की मरम्मत नहीं की गई तो खंडहर होती इमारत को काई ने भी घेरना शुरू कर दिया।
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कमरों की खिड़कियां, रोशनदान गायब हो चुके हैं। दरवाजों की चौखटों पर दीमक ने घर बना रखा है। यही नहीं जगह कम पड़ने की वजह से किसी-किसी कक्षा में 80 बच्चे बैठाए गए हैं। रसायन विज्ञान प्रयोगशाला ऐसी है जैसे नगरपालिका का शौचालय। दीवारों में करंट दौड़ने की वजह से कोई इनसे सटकर नहीं बैठता। बच्चों पर कब कौन सी बड़ी विपदा आ जाए कहा नहीं जा सकता लेकिन जिन्हें चिंता करनी चाहिए वही तमाशबीन बने बैठे हैं। प्रधानाचार्य अशोक कुमार मिश्रा का कहना है कि इंटर का दर्जा मिलने के बाद नया भवन नहीं बना और रमसा के सर्वेक्षण में विद्यालय के भवनविहीन होने की बात शिक्षा अधिकारियों के संज्ञान में लाई गई है। विद्यालय प्रबंधंन समिति ने भी क्षेत्रीय विधायक अमृता रावत से विद्यालय के वर्तमान भवन की मरम्मत करवाकर चार नए कक्षों बनाने की मांग की है।
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प्रधानाचार्य अशोक कुमार मिश्रा का कहना है कि बिजली की लाइनें कई जगह कटी हैं। विद्यालय स्तर से इनकी तीन बार मरम्मत कराई जा चुकी है, मगर बरसात के मौसम में दीवारों पर सीलन फैलने की वजह से कटी लाइनों का करंट दीवारों में आने लगता है। पिछली बरसातों में भी इस तरह की समस्या आई है। उनका कहना है कि दीवार का जितना हिस्सा सीलन से घिरा है उसी हिस्से में करंट का प्रभाव है। रिपेयरिंग करा दी है। बरसात के समय दीवारों में करंट आ जाता है।
टॉपर दिया था स्कूल ने
जीआईसी रामनगर उन विद्यालयों में है जिसने 2012 की बोर्ड परीक्षा में राज्य को मेरिट का टॉपर दिया था। इस हालत के बावजूद छात्र समीर रियाज ने 10वीं में राज्य में पहला स्थान आया था, मगर टॉपर देने वाले विद्यालय की बदहाली और जगह की कमी के चलते अब यहां नए छात्रों को भी प्रवेश मिलना मुश्किल हो रहा है।