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कार्यकर्ताओं की तलाश कॉलेज की चौखट पर ले आती है
Updated Wed, 11 Oct 2017 02:11 AM IST
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हल्द्वानी। एमबीपीजी कॉलेज का छात्र संघ चुनाव आखिरकार यह भी साफ कर गया कि छात्रों के बीच बड़े नेता अपने और अपनी पार्टी के लिए कार्यकर्ताओं की तलाश में ही पहुंच रहे हैं। पिछले छात्र संघों के चुनाव में जीते छात्र नेताओं का हाल इसकी पुष्टि ही कर रहा है। प्रदेश की राजनीति से भी यही जाहिर हो रहा है।
राज्य गठन के बाद से अब तक की राजनीति में छात्र संघों से उभर कर आए नेता न के बराबर ही मिलेंगे। इतना होने पर भी छात्र संघों के चुनाव में बड़े कद के नेताओं की दखल बराबर रहती आई है। एमबीपीजी कॉलेज के चुनाव में तो खुद उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने मोरचा संभाल लिया था। कांग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए इंदिरा हृदयेश ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इंदिरा के साथ बस इतनी भर राहत थी कि वे खुद पूरी तरह से खुल कर सामने नहीं आती थीं। धन सिंह खुल कर सामने आए तो इस पर इंदिरा हृदयेश ने इस बार यह बंदिश भी तोड़ डाली। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश भी छात्रों के एक पक्ष के साथ जा खड़ी हुईं। आखिर यह मारामारी हुई किस लिए? प्रदेश की राजनीति का हाल देखें। प्रदेश में ऐसे कई नेता मिल जाएंगे जो ग्राम प्रधान से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने के बाद मंत्री पद तक पहुंचे। पंचायत की सबसे निचली सीढ़ी भी सत्ता के ऊंचे मंच तक ले जाने वाली साबित हो रही है। इसके उलट प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में छात्र नेताओं का दखल न के बराबर रहा है। छात्र राजनीति से सफर शुरू करने वाले नेता बाद में गुमनाम होकर ही रह जा रहे हैं। कोई नहीं पूछता कि आखिरकार पूर्व छात्र संघों के कई अध्यक्ष अब कर क्या रहे हैं। साफ है कि छात्र राजनीति प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति के लिए सिर्फ एक जरिया भर है। छात्रों के बीच पैठ बनाकर पार्टियों को अपने लिए उत्साही और बेहतर कार्यकर्ता जरूर मिल जा रहे हैं।
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राज्य गठन के बाद से अब तक की राजनीति में छात्र संघों से उभर कर आए नेता न के बराबर ही मिलेंगे। इतना होने पर भी छात्र संघों के चुनाव में बड़े कद के नेताओं की दखल बराबर रहती आई है। एमबीपीजी कॉलेज के चुनाव में तो खुद उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने मोरचा संभाल लिया था। कांग्रेस सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए इंदिरा हृदयेश ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इंदिरा के साथ बस इतनी भर राहत थी कि वे खुद पूरी तरह से खुल कर सामने नहीं आती थीं। धन सिंह खुल कर सामने आए तो इस पर इंदिरा हृदयेश ने इस बार यह बंदिश भी तोड़ डाली। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश भी छात्रों के एक पक्ष के साथ जा खड़ी हुईं। आखिर यह मारामारी हुई किस लिए? प्रदेश की राजनीति का हाल देखें। प्रदेश में ऐसे कई नेता मिल जाएंगे जो ग्राम प्रधान से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने के बाद मंत्री पद तक पहुंचे। पंचायत की सबसे निचली सीढ़ी भी सत्ता के ऊंचे मंच तक ले जाने वाली साबित हो रही है। इसके उलट प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में छात्र नेताओं का दखल न के बराबर रहा है। छात्र राजनीति से सफर शुरू करने वाले नेता बाद में गुमनाम होकर ही रह जा रहे हैं। कोई नहीं पूछता कि आखिरकार पूर्व छात्र संघों के कई अध्यक्ष अब कर क्या रहे हैं। साफ है कि छात्र राजनीति प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति के लिए सिर्फ एक जरिया भर है। छात्रों के बीच पैठ बनाकर पार्टियों को अपने लिए उत्साही और बेहतर कार्यकर्ता जरूर मिल जा रहे हैं।
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