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कविता के पीछे गूंजते संगीत और भाव को समझने पर दिया बल
Updated Sat, 01 Dec 2018 01:47 AM IST
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नैनीताल। हिंदी विभाग कुमाऊं विश्वविद्यालय, यूपी भाषा संस्थान लखनऊ, महादेवी वर्मा सृजनपीठ के सहयोग से हर्मिटेज भवन में शुक्रवार को भी संगोष्ठी जारी रही। इसका विषय हिंदी भक्तिकाव्य के सामाजिक सरोकार है। इसमें वक्ताओं ने कविता के संगीत, भाव को समझना जरूरी बताया।
संगोष्ठी में असिस्टेंट प्रो. रूमा साह, धर्मेंद्र प्रताप सिंह, सोनपाल, सुधीर कुमार ओझा मेरठ, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा आगरा, डॉ. सुरेश तायडे़ महाराष्ट्र, मनोज फगवाड़वी पंजाब, डॉ. अर्चिता सिंह, दिव्या पाठक, युवराज सिंह, खेमकरण सोमन, अमित दिल्ली, डॉ. अनिल कार्की ने भक्तिकाव्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया। सत्र के समापन में मुख्य वक्ता गोपेश्वर सिंह ने भक्तिकाल की कविताओं के प्रति छात्रों की रुचि जगाने के लिए अध्यापकों को गायन शैली में पदों को पढ़कर सुनाने का सुझाव दिया। कविता के पीछे गूंजते संगीत और भाव को समझने पर बल दिया। इस सत्र का संचालन शालिनी नागर एवं जावेद अली ने किया। संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र के मुख्य अतिथि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनएस बिष्ट रहे। डीएसबी परिसर के शोधार्थी जावेद अली, शालिनी नागर, राजेश कुमार, भावना उपाध्याय, चंद्रा बिष्ट, सुनीता बिष्ट, विपिन चंद्र, बद्रीप्रसाद सेमवाल, अर्जुन सिंह, शिवप्रकाश त्रिपाठी, अजेय पांडेय, सुनील कुमार कुशवाहा, संदीप तिवारी, रवि यादव, समर बहादुर यादव, कविता उप्रेती, अनीता पांडेय, दीपाली आर्या, अरविंद कुमार मौर्य, चंद्रमा प्रसाद, संदीप त्रिपाठी, जया बरनवाल, पूनम, निशा साहू, हेमा जोशी, पुष्पा बुढलाकोटी इत्यादि ने शोधपत्र पढ़े। प्रो. नीरजा टंडन ने धन्यवाद किया। प्रो. नीरजा टंडन की अध्यक्षता में प्रो. निर्मला ढैला बोरा ने संचालन किया। मंच पर संगोष्ठी संयोजक हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मानवेंद्र पाठक, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह मुख्य वक्ता रहे।
कविता के संगीत, भाव को समझना जरूरी
हिंदी भक्तिकाव्य के सामाजिक सरोकार विषय पर संगोष्ठी
कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने पढ़े शोधपत्र
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संगोष्ठी में असिस्टेंट प्रो. रूमा साह, धर्मेंद्र प्रताप सिंह, सोनपाल, सुधीर कुमार ओझा मेरठ, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा आगरा, डॉ. सुरेश तायडे़ महाराष्ट्र, मनोज फगवाड़वी पंजाब, डॉ. अर्चिता सिंह, दिव्या पाठक, युवराज सिंह, खेमकरण सोमन, अमित दिल्ली, डॉ. अनिल कार्की ने भक्तिकाव्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया। सत्र के समापन में मुख्य वक्ता गोपेश्वर सिंह ने भक्तिकाल की कविताओं के प्रति छात्रों की रुचि जगाने के लिए अध्यापकों को गायन शैली में पदों को पढ़कर सुनाने का सुझाव दिया। कविता के पीछे गूंजते संगीत और भाव को समझने पर बल दिया। इस सत्र का संचालन शालिनी नागर एवं जावेद अली ने किया। संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र के मुख्य अतिथि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनएस बिष्ट रहे। डीएसबी परिसर के शोधार्थी जावेद अली, शालिनी नागर, राजेश कुमार, भावना उपाध्याय, चंद्रा बिष्ट, सुनीता बिष्ट, विपिन चंद्र, बद्रीप्रसाद सेमवाल, अर्जुन सिंह, शिवप्रकाश त्रिपाठी, अजेय पांडेय, सुनील कुमार कुशवाहा, संदीप तिवारी, रवि यादव, समर बहादुर यादव, कविता उप्रेती, अनीता पांडेय, दीपाली आर्या, अरविंद कुमार मौर्य, चंद्रमा प्रसाद, संदीप त्रिपाठी, जया बरनवाल, पूनम, निशा साहू, हेमा जोशी, पुष्पा बुढलाकोटी इत्यादि ने शोधपत्र पढ़े। प्रो. नीरजा टंडन ने धन्यवाद किया। प्रो. नीरजा टंडन की अध्यक्षता में प्रो. निर्मला ढैला बोरा ने संचालन किया। मंच पर संगोष्ठी संयोजक हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मानवेंद्र पाठक, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह मुख्य वक्ता रहे।
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कविता के संगीत, भाव को समझना जरूरी
हिंदी भक्तिकाव्य के सामाजिक सरोकार विषय पर संगोष्ठी
कुमाऊं विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने पढ़े शोधपत्र